किस्सा कैंपस का: कला हो या विज्ञान जीत जाओगे तो सिकंदर कहलाओगे
बात साल 1990 की है। मैंने इंटरमीडिएट परीक्षा पास की थी। 51 प्रतिशत मात्र मैं इंटरमीडिएट में ला पाया था। मुझे अब कॉलेज में प्रवेश लेना था। हल्द्वानी शहर में एमबी डिग्री कॉलेज ही एकमात्र उच्च शिक्षा का संस्थान था। जुलाई का उमस से भरा हुआ दिन, मैं अपने बड़े भाई जो पंतनगर विश्वविद्यालय में पढ़ते थे, उनके साथ एमबी डिग्री कॉलेज आया। स्कूल की बंधनों से भरी हुई जिंदगी से बाहर निकल कर अब हम कॉलेज की जिंदगी में आ रहे थे। एमबी डिग्री कॉलेज के बड़े से फील्ड में बहुत सारे लड़के लड़कियां घूम रहे थे। मैं बीएससी करना चाहता था लेकिन मेरे प्रतिशत कम थे। खैर अपने बड़े भाई के साथ मैं उस कक्षा में गया, जहां बीएससी में एडमिशन दिया जा रहा था। मैं काउंसिलिंग के लिए वहां गया, पता चला कि बीएससी में प्रवेश की कम से कम मेरिट 58 प्रतिशत की है जबकि मेरे मात्र 51 प्रतिशत थे।
काउंटर पर पता चला कि वेटिंग में कुछ नीचे तो आ सकता है लेकिन कई वर्षों से 55 प्रतिशत से नीचे मेरिट कभी नहीं गई है इसलिए बीएससी में प्रवेश नहीं मिल सकेगा हां अगर बायोलॉजी वाले हैं तो कुछ उम्मीद की जा सकती है लेकिन सच्चाई यह थी कि मेरे पास इंटरमीडिएट में बायोलॉजी के सब्जेक्ट ही नहीं थे इसलिए वह रास्ता तो वैसे ही मेरे लिए बंद था। मैं बहुत निराश था। मैंने कुछ लोगों से बात की। एमबी डिग्री कॉलेज के कुछ कर्मचारी हमारे जानने वाले थे। उनसे मिलने गया और उन्होंने भी स्पष्ट कर दिया कि बीएससी में मुझे एडमिशन नहीं मिल पाएगा। दूसरा चारा यह था कि मैं बीकॉम में एडमिशन ले लूं लेकिन कॉमर्स मेरी इंटरमीडिएट में नहीं थी और मेरे समझ से बहुत बाहर भी थी। अब एक ही रास्ता बसता था कि बीए में एडमिशन लेने का।
इस दौरान हम दोनों भाई कला संकाय के एक प्राचार्य से मिले और उन्हें बताया तो उन्होंने भी यही कहा कि इतने कम प्रतिशत में केवल ह्यूमैनिटीज के सब्जेक्ट ही लिए जा सकते हैं और बेहतर होगा कि आपका भाई कॉलेज से बीए में प्रवेश ले ले। मैं बहुत निराश था क्योंकि बीए करने वालों का भविष्य उस समय बहुत अच्छा नहीं माना जाता था लेकिन वह प्राचार्य महोदय जो कि अर्थशास्त्र पढ़ाया करते थे, वह प्रोफेसर रौतेला थे, उन्होंने बताया कि ऐसा नहीं है कि बीए करने से सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। अगर वास्तव में आप कुछ करना चाहते हो तो बहुत सारी कॉम्पिटेटिव परीक्षाओं की तैयारी आर्ट्स में रहते हुए आप बेहतर कर सकते हो क्योंकि आप ज्यादा समय परीक्षा की तैयारी में लगा सकते हो और परीक्षाओं की तैयारी में आर्ट्स के विषय सामान्य अध्ययन की तैयारी में भी मददगार हो सकते हैं।
आप बीए में प्रवेश लें और उन्होंने तमाम ऐसे लोगों के नाम बताएं जिन्होंने बीए करने के पश्चात आईएएस, पीसीएस एसएससी और विभिन्न सरकारी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की और अफसर बने । कोई और चारा नही देखते हुए अंततः मैंने भी यही निर्णय लिया और बीए में प्रवेश ले लिया। प्रोफेसर रौतेला के सुझाव से मैंने इतिहास, अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान विषय लिया और मन में धारण कर लिया कि अब मुझे सरकार के किसी अफसर की पोजीशन को पाना है। कैंपस का यह पहला दिन हमेशा मेरे जहन में रहा, बीए चलता रहा, लेकिन मस्तिष्क में यह बात लगातार बनी रही कि सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करनी है और यही वह दिन था, जब मेरी मेरे जीवन में टर्निंग पॉइंट आया और मैं एक विज्ञान का छात्र, एक कला वर्ग के छात्र के रूप में परिवर्तित हुआ और कालांतर में उत्तर प्रदेश पीसीएस एवं उत्तराखंड पीसीएस दोनों परीक्षा में सफलता प्राप्त करते हुए दो-दो सरकारी नौकरियां प्राप्त की और वर्तमान में आरटीओ के पद पर अपनी सेवाएं दे रहा हूं। इससे पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार में 8 वर्ष डिप्टी जेलर के रूप में अपनी सेवा दे चुका हूं। कला हो या विज्ञान जीत जाओगे तो सिकंदर कहलाओगे और यही कैंपस के पहले दिन की सीख थी, जो आज भी अनुभूत होती है।
