कुमाऊंनी होली : नाद, राग और स्वर की जीवित विरासत

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Published By Anjali Singh
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कुमाऊं की होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत की भाव-समृद्ध परंपरा का जीवंत उत्सव है। यहां होली नाद, राग और स्वर के विशिष्ट संयोजन से सजी होती है। जिन्होंने भी इस परंपरा को अपने ज्ञान, साधना और सुरों की तपस्या से आगे बढ़ाया, उनकी समझ और गायकी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। कुमाऊंनी होली में शास्त्रीय संगीत का अनुशासन भी है और लोकजीवन की सहजता भी, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। -हरीश उप्रेती करन, हल्द्वानी

 उत्साह, ढोल और आलू के गुटकों की महक

एक समय था जब गांवों में होली का इंतजार बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को रहता था। बड़े ढोल की थाप पर गोल घेरे में खड़े होकर होली गाई जाती थी। कम से कम बीस-पच्चीस होलियारों की टोली, ढोल की गूंज और बीच-बीच में मिलने वाले गुड़ या आलू के गुटके, बच्चों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था, जो लोग रोजगार के लिए बाहर गए होते, वे भी होली पर अपने घर जरूर लौटते थे। उनकी उपस्थिति से गांव में रौनक बढ़ जाती और बच्चों को होलियारों की टोली में शामिल होने का अवसर मिलता, लेकिन समय बदला, पलायन बढ़ा और त्योहारों पर घर लौटने की परंपरा कम होती गई। गांव खाली होने लगे और होली गायन की धारा भी मंद होने लगी। अब इस परंपरा को बचाए रखने की जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर है। मुझे याद है जब गांव का होली में प्रयोग होने वाला बड़ा ढोल खराब हो गया था और उसे उपयोग में नहीं लाया जा सका। मान्यता थी कि एक बार होली छोड़ दी तो फिर वह दोबारा नहीं हो सकती इसलिए तब हमने एक कनस्तर को ही ढोल बना लिया और पूरे गांव में होली गाई। वह साधन भले ही साधारण था, पर उत्साह और परंपरा के प्रति समर्पण असाधारण था।

बैठकी और खड़ी होली : अनुशासन और उल्लास

कुमाऊं में मुख्यतः दो प्रकार की होली प्रचलित हैं बैठकी और खड़ी होली। बैठकी होली में शास्त्रीय रागों का आधार स्पष्ट दिखाई देता है। यह विशेष रूप से अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल और चंपावत में अपने पूरे सौंदर्य के साथ जीवित है। खड़ी होली खुले स्थान पर गोल घेरे में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते हुए गाई जाती है। इसमें सामूहिकता और उत्सवधर्मिता का अद्भुत संगम होता है।

स्त्रियों की होलियां और मर्यादा का संगीत

पहाड़ों में महिलाओं की होलियां और स्वांग भी अत्यंत रोचक होती हैं। वे तात्कालिक रचनाएं करती हैं, श्रृंगार और हंसी-ठिठोली के रंग बिखेरती हैं, पर मर्यादा का ध्यान बनाए रखती हैं। शिव के मन माहि बसे काशी, जल कैसे भरूं जमुना गहरी जैसी होलियां आज भी लोकप्रिय हैं।

चंपावत : होली परंपरा का अग्रणी जनपद

वर्तमान समय में यदि पुरानी परंपरा से कुमाऊंनी होली की जीवंतता की बात करें तो चंपावत जनपद अग्रणी माना जाता है। कभी चंद्रवंशी शासकों की राजधानी रही यह चंपा नगरी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ अपनी सांगीतिक परंपराओं के लिए भी जानी जाती है। हालांकि यहां की होली में बरसाना की लठमार होली की तरह को विशेषता तो नहीं, पर अपनी सौम्यता और सामूहिक नृत्य-गायन और होलियारों विशेष कदम और ढोल की थाप के कारण यह विशिष्ट पहचान रखती है। यहां महिलाएं और पुरुष समान रूप से दिन में गोल घेरे में खड़े होकर होली गाते हैं। होली में विजयसार की लकड़ी से बने ढोलों का प्रयोग होता है, जिनकी कीमत आज बीस हजार से 30 हजार रुपये तक हो सकती है।

परंपरा की चुनौती और हमारी जिम्मेदारी

आज पलायन, आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है। शराब जैसी कुप्रथाएं भी कहीं-कहीं इस पावन उत्सव की गरिमा को प्रभावित करती हैं। फिर भी आशा की किरण जीवित है, जब तक युवाओं में अपने लोक-संगीत और संस्कृति के प्रति प्रेम रहेगा, कुमाऊंनी होली का नाद गूंजता रहेगा। कुमाऊं की होली केवल गीत नहीं, बल्कि पीढ़ियों से हस्तांतरित होती आ रही सांस्कृतिक चेतना है। इसे संजोना और आगे बढ़ाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी ढोल की थाप पर उसी उल्लास से गा सकें ‘बलमा घर आए फागुन में...’