पंछियों को ‘अंधा’ भी बना देता है प्रेम
क्या प्यार वाकई अंधा होता है? वैज्ञानिकों ने पक्षियों की दुनिया का वह विरोधाभास उजागर किया है, जहां नर तीतरों का सौंदर्य ही उनकी दृष्टि की बाधा बन जाता है। प्रेम की उस महंगी कीमत की दास्तान, जहां आकर्षण ही जान का जोखिम बन जाता है। ‘प्यार अंधा होता है’ यह कहावत इंसानी रिश्तों पर तो सटीक बैठती ही है, लेकिन ताजा वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि पक्षियों की दुनिया में यह केवल कहावत नहीं, बल्कि एक कठोर सच्चाई है। आमतौर पर नर पक्षी रंग-रूप, पंखों की बनावट और प्रणय-नृत्य आदि में मादाओं से कहीं अधिक आकर्षक होते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने अब यह सवाल उठाया है कि क्या नर पक्षियों की यह सुंदरता हमेशा उनके लिए लाभप्रद सिद्ध होती है? -डॉ. कैलाश चंद सैनी
.jpg)
वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, ‘क्राइसोलोफस’ वंश की दो पक्षी प्रजातियां- गोल्डन तीतर और लेडी ऐम्हर्स्ट तीतर इस तथ्य के सबसे रोचक उदाहरण के रूप में उभरे हैं। इन नर तीतरों के सिर पर राजाओं की तरह एक सुंदर कलगी और गर्दन के चारों ओर पंखों का खूबसूरत घेरा होता है, जो प्रजनन काल में मादा को रिझाते समय किसी जादुई पर्दे की तरह फैल जाता है। दिखने में बेहद भव्य लगने वाली यही सजावट उनकी आंखों की दृष्टि के लिए सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इन नर तीतरों का दृश्य क्षेत्र यानी देखने का दायरा मादाओं की तुलना में काफी कम हो जाता है। उनके ‘ब्लाइंड एरिया’ (जहां आंखों से कुछ भी दिखाई नहीं देता), मादाओं की तुलना में लगभग 137 प्रतिशत अधिक पाया गया है। इतना ही नहीं, उनकी द्विनेत्री (बाइनोक्युलर) दृष्टि, जो दोनों आंखों से एक साथ देखने और दूरी का अनुमान लगाने में मदद करती है, वह भी औसतन 41 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
यह स्थिति लगभग वैसी ही है, जैसे कोई व्यक्ति माथे तक झुकी हुई लंबी छज्जे वाली कैप पहनकर चारों ओर निगरानी रखने की कोशिश करे, उसे न तो ऊपर से आता खतरा साफ दिखेगा और न ही किनारों की हलचल। यह वैज्ञानिक खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब तक दुनियाभर की करीब 300 पक्षी प्रजातियों के अध्ययन में नर और मादा के देखने के दायरे में इतना बड़ा अंतर कभी दर्ज नहीं किया गया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि इन्हीं के निकट संबंधी सिल्वर और ग्रीन तीतरों में ऐसा कोई अंतर नहीं पाया गया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्यार के लिए चुकाई जाने वाली यह कीमत केवल दृष्टि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उनके जीवन के लिए भी खतरा पैदा करती है। दृष्टि में आई यह कमी नर तीतरों को शिकारियों के प्रति अधिक असुरक्षित बना देती है, विशेषकर उस समय जब वे नीचे झुककर दाना चुग रहे होते हैं और ऊपर से आने वाले खतरों को नहीं देख पाते, लेकिन संतोष की बात यह है कि यह अंधापन स्थायी नहीं होता।
प्रकृति ने उनके अस्तित्व को बचाने के लिए एक संतुलन भी बनाया है। साल के कुछ महीनों में जब इन पक्षियों के पंख झड़ जाते हैं और यह भारी-भरकम सजावट हट जाती है, तब उनकी दृष्टि फिर से पूरी तरह सामान्य हो जाती है। यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति में नियंत्रण और संतुलन का नियम कितना सूक्ष्म है, जो सौंदर्य जीवन के नए अध्याय यानी प्रेम को आमंत्रित करता है, वही कभी-कभी जीवन के अंत का कारण भी बन सकता है। इसीलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस प्राकृतिक संसार में पक्षी भी कभी-कभी प्यार में अंधे हो जाते हैं।
