आर्द्रभूमि: विज्ञान, जीवन और संस्कृति का संगम
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदायिनी और पूजनीय सत्ता के रूप में देखा गया है। जल, भूमि, वन और जीव-जंतु—सभी को धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति से जोड़ा गया। इसी सांस्कृतिक दृष्टि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, लेकिन आज उपेक्षित पक्ष हैं आर्द्रभूमियां- तालाब, झीलें, सरोवर, नदी किनारे के दलदली क्षेत्र, बाढ़ के मैदान और तटवर्ती जलक्षेत्र। भारतीय सभ्यता के विकास, धार्मिक परंपराओं, सामाजिक जीवन और आजीविका में आर्द्रभूमियों की भूमिका केंद्रीय रही है।
प्राचीन भारत में आर्द्रभूमियों को केवल जलस्रोत नहीं माना गया, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र का दर्जा प्राप्त था। वेदों में जल को जीवन का मूल तत्व कहा गया है- ‘आपः प्राणाः’। ऋग्वेद, अथर्ववेद और उपनिषदों में जलाशयों, नदियों और सरोवरों की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह दृष्टि स्पष्ट करती है कि भारतीय संस्कृति में आर्द्रभूमियां जीवन के संरक्षण और संतुलन का प्रतीक रही हैं। --डॉ. जितेंद्र शुक्ला वन्य जीव विशेषज्ञ
भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में आर्द्रभूमियों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। देश के लगभग हर प्रमुख तीर्थ का संबंध किसी न किसी नदी, सरोवर या जलाशय से जुड़ा हुआ है। काशी में गंगा, प्रयाग में संगम, पुष्कर का सरोवर और अमृतसर का अमृत सरोवर इस तथ्य के जीवंत उदाहरण हैं। ये आर्द्रभूमियां केवल जल स्रोत नहीं थीं, बल्कि पूजा, तप, संस्कार और आत्मशुद्धि का माध्यम भी थीं। मंदिरों के साथ निर्मित पुष्करणी, कुंड और बावड़ियां स्थापत्य की उत्कृष्ट कृतियां होने के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक जीवन का अभिन्न अंग थीं।
भारतीय ग्रामीण जीवन की धुरी भी आर्द्रभूमियां ही रही हैं। गांव का तालाब सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं था, बल्कि सामूहिक चेतना का केंद्र था। वहीं से सिंचाई होती थी, पशुओं को पानी मिलता था, मछली पालन होता था और अनेक लोक परंपराएं जन्म लेती थीं। छठ पूजा, कार्तिक स्नान, गंगा दशहरा और मकर संक्रांति जैसे पर्व सीधे तौर पर जल और आर्द्रभूमियों से जुड़े हुए हैं। ये उत्सव दर्शाते हैं कि भारतीय संस्कृति में जल केवल भौतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान था।
भारतीय दर्शन के पंचमहाभूत सिद्धांत में जल और पृथ्वी के संतुलन को जीवन का आधार माना गया है। आर्द्रभूमियां इसी संतुलन की जीवंत अभिव्यक्ति हैं, जहां जल और भूमि का समन्वय होता है। इसी कारण तालाब या सरोवर को पाटना पाप और जलाशय निर्माण को पुण्य कार्य माना गया। इतिहास भी इस सोच की पुष्टि करता है। मौर्य, गुप्त, चोल और विजयनगर काल में तालाबों और जलाशयों का व्यापक निर्माण हुआ। दक्षिण भारत का एरी सिस्टम, राजस्थान की जोहड़ और उत्तर भारत की बावड़ियां भारतीय समाज की वैज्ञानिक और सामुदायिक जल-संरक्षण परंपरा का प्रमाण हैं।
लोक साहित्य और परंपराओं में भी आर्द्रभूमियों की गहरी छाप दिखाई देती है। लोकगीतों और कथाओं में तालाब, कमल, मछली और पक्षियों का बार-बार उल्लेख मिलता है। दलदली जल में खिलने वाला कमल भारतीय संस्कृति में पवित्रता और सौंदर्य का प्रतीक बना। लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों का कमल पर विराजमान होना आर्द्रभूमियों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।
आधुनिक विज्ञान जिन गुणों को आज आर्द्रभूमियों की विशेषता मानता है। जल संरक्षण, जैव विविधता, बाढ़ नियंत्रण और भूजल पुनर्भरण, उनका अनुभव भारतीय समाज ने सदियों पहले अपने जीवन में उतार लिया था। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार आर्द्रभूमियां पृथ्वी की कुल भूमि का लगभग छह प्रतिशत क्षेत्र घेरती हैं, लेकिन इसके बावजूद विश्व की लगभग चालीस प्रतिशत जैव विविधता को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहारा देती हैं। ये प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती हैं, जो अत्यधिक वर्षा के समय बाढ़ को नियंत्रित करती हैं और सूखे में नमी बनाए रखती हैं।
भूजल पुनर्भरण में भी इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब आर्द्रभूमियां नष्ट होती हैं, तो इसका सीधा असर भूजल स्तर पर पड़ता है। इसके अलावा ये प्राकृतिक जल शोधन संयंत्र की तरह काम करती हैं। पौधे और सूक्ष्म जीव प्रदूषकों को अवशोषित कर जल को स्वच्छ बनाते हैं। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी आर्द्रभूमियां कार्बन सिंक के रूप में महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर मैंग्रोव और पीटलैंड क्षेत्र। दुर्भाग्यवश आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में आर्द्रभूमियां अतिक्रमण, प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछली एक सदी में विश्व की लगभग पैंतीस प्रतिशत आर्द्रभूमियां नष्ट हो चुकी हैं। जब तालाब सूखते हैं, तो केवल जल नहीं, बल्कि उससे जुड़ी संस्कृति, परंपरा और सामूहिक स्मृति भी समाप्त हो जाती है।
अंततः यह समझना होगा कि आर्द्रभूमियां प्रकृति का कोई अलग-थलग हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वही कड़ी हैं, जो जल, भूमि, वायु और जीवन को एक सूत्र में बांधती हैं। यदि आर्द्रभूमियां सुरक्षित हैं, तो नदियां जीवित रहेंगी, भूजल स्थिर रहेगा, जैव विविधता फलती-फूलती रहेगी और जलवायु संतुलन बना रहेगा, लेकिन यदि इन्हें नजरअंदाज किया गया, तो विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आर्द्रभूमियों पर ही प्रकृति का संतुलन टिका है और उनका संरक्षण हमारे भविष्य की अनिवार्य शर्त है।
