पौराणिक कथा: स्वयं मुक्त, वही मुक्तकर्ता

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Published By Anjali Singh
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प्राचीन समय की बात है, एक शक्तिशाली राजा के मन में मोक्ष की तीव्र अभिलाषा जागी। उसने अपने राजपंडित को दरबार में बुलाया और एक कठिन चुनौती रखी। राजा ने कहा, “मैंने सुना है कि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को मात्र सात दिनों में श्रीमद्भागवत सुनाकर जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर दिया था। मैं आपको एक माह का समय देता हूं, आप मुझे मोक्ष का मार्ग दिखाएं। यदि आप सफल हुए तो पुरस्कृत होंगे, अन्यथा आपकी संपत्ति जब्त कर आपको मृत्युदंड दिया जाएगा।”

राजपंडित शास्त्रों के ज्ञाता तो थे, परंतु उनके पास वह आत्मिक अनुभव नहीं था, जो किसी को संसार के मोह-पाश से मुक्त कर सके। राजा की आज्ञा ने उनकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया। मृत्यु का भय और असफलता की चिंता, उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। उनकी इस दशा को उनके युवा पुत्र ने भांप लिया। जब पुत्र को कारण ज्ञात हुआ, तो वह बिल्कुल विचलित नहीं हुआ। उसने शांत स्वर में कहा, “पिताजी, आप चिंता छोड़ दें। राजा से कहें कि वे मुझे अपना गुरु स्वीकार करें और मेरे निर्देशों का अक्षरशः पालन करने का वचन दें।” राजपंडित को पुत्र की बातों में एक आशा की किरण दिखी।

अगले दिन दरबार में भारी भीड़ उमड़ी। राजपंडित का पुत्र शांत मुद्रा में राजा के सम्मुख खड़ा था। उसने राजा को वचन की याद दिलाई और एक मजबूत रस्सी मंगवाई। दरबार में सन्नाटा छा गया, जब बालक ने आदेश दिया, “राजा को इस खंभे से कसकर बांध दिया जाए।” राजा अपने वचन से बंधा था, इसलिए उसने विरोध नहीं किया। इसके तुरंत बाद, बालक ने अपने पिता को भी दूसरे खंभे से बंधवा दिया। पंडित जी अपने बेटे की इस ‘मूर्खता’ पर क्रोधित थे, पर तभी पुत्र ने कहा, ‘पिताजी, अब आप राजा के बंधन खोल दीजिए।’ 

राजपंडित झुंझलाकर चिल्लाए, “अरे मूर्ख! क्या तू देख नहीं सकता कि मैं स्वयं बंधा हुआ हूं? जो स्वयं बंधा हो, वह दूसरे के बंधन कैसे खोल सकता है?” यही वह क्षण था, जिसका बालक को इंतजार था। राजा की आंखों में चमक आ गई। वह समझ गया कि जो राजपंडित स्वयं पद, धन और मृत्यु के भय की रस्सी से बंधा है, वह उसे संसार की माया से कैसे मुक्त कर सकता है? राजा ने विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, मैं समझ गया। केवल वही महापुरुष हमें संसार से मुक्त कर सकता है, जो स्वयं वासनाओं और मोह से ऊपर उठ चुका हो।” राजा ने राजपंडित को उनके दंड और भय से मुक्त कर दिया और उस बालक के चरणों में नतमस्तक हो गया।

 

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