बोधकथा: संस्कारों का प्रभाव

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Published By Anjali Singh
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चौथी कक्षा में पढ़ने वाला नन्हा सुबोध केवल किताबों का ही नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का भी विद्यार्थी था। रात्रि की धार्मिक पाठशाला ने उसके भीतर वे बीज बो दिए थे, जो बड़ों-बड़ों के पास नहीं होते। एक शाम नियति उसे घर से दूर ले गई और वह डाकुओं के चंगुल में फंस गया। दस लाख की फिरौती मांगी गई, घर में कोहराम मच गया, लेकिन उस अपहृत बालक के मन में एक अद्भुत शांति थी।

कैद की उन अंधेरी दीवारों के पीछे भी सुबोध की दिनचर्या नहीं बदली। वह भोर में उठकर मधुर स्वर में ‘ओंकार मंत्र’ और ‘मेरी भावना’ का पाठ करता। जब डर उसे घेरने की कोशिश करता, तो वह ‘बारह भावना’ का चिंतन करता। वह खुद को समझाता कि यह उसके पिछले कर्मों का उदय है, इसमें किसी का दोष नहीं। उसकी यह समता और भक्ति देखकर वहां का वातावरण बदलने लगा।

शुद्ध आचरण का प्रभाव इतना गहरा था कि डाकू की वृद्ध मां का हृदय पसीज गया। सुबोध ने दो दिन तक वहां का अभक्ष्य भोजन नहीं छुआ। उसकी निष्ठा देख उस वृद्धा ने स्वयं बर्तन मांजे, पानी छाना और पूरी शुद्धता के साथ उसके लिए भोजन बनाया। सुबोध के मुख से पुण्य-पाप और धर्म की चर्चा सुन वह चकित रह जाती थी। अपने डाकू बेटे के घर आने पर उसने, उसको सब बातें बताई और लड़के को छोड़ने के लिए कहा। एक दिन डाकू ने सुबोध की परीक्षा लेनी चाही। उसने गरजते हुए बंदूक तानी और कहा, “तेरे बाप ने पैसे नहीं भेजे, अब तू मरने के लिए तैयार हो जा।” सुबोध ने शांति के साथ निर्भीकता से अपनी कमीज हटाई और सीना तानकर कहा- “मार दो! तुम केवल इस नश्वर शरीर को मिटा सकते हो, मेरी आत्मा तो अजर-अमर है।”

यह सुनकर वह दंग रह गया कि जिस मौत के डर से दुनिया कांपती है, उसे यह बालक खिलौना समझ रहा है। उसी क्षण डाकू का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने सुबोध के पैर छुए और जुआ, मांस, मदिरा जैसे दुर्व्यसनों का सदा के लिए त्याग कर दिया।

अंततः सुबोध अपने घर लौटा, लेकिन वह अपने पीछे एक बदला हुआ इंसान छोड़ आया था। वह डाकू बाद में इतना वैरागी हुआ कि उसने स्वयं को शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। इस कथा से सीख मिलती है कि संस्कार केवल शब्दों में नहीं, आचरण में होने चाहिए। यदि हमारे भीतर ‘भेद-विज्ञान’ (आत्मा और शरीर का अंतर) की स्पष्ट समझ हो, तो हम बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी अडिग रह सकते हैं।