बरेली हिंसा : इलाहाबाद HC ने बवाल से जुड़ी इस FIR को रद्द करने से किया इनकार
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हिंसक भीड़ द्वारा पुलिस पर हमले के मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया आरोप अत्यंत गंभीर हैं और पूरे घटनाक्रम की गहन जांच आवश्यक है। अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल याचिका में आरोपों की सत्यता या असत्यता का परीक्षण नहीं किया जा सकता।
अतः यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें प्रारंभिक स्तर पर प्राथमिकी रद्द की जा सके। उक्त आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने आशु व अन्य की याचिकाएं खारिज करते हुए पारित किया और माना कि इस मामले में अवैध जमावड़े द्वारा पुलिस पर हमला, पत्थरबाजी, एसिड से भरी बोतलें फेंकने और गोली चलाने जैसे गंभीर आरोप हैं, जिनकी जांच आवश्यक है।
मामले के अनुसार 26 सितंबर 2025 को थाना बारादरी, बरेली के एसएचओ धनंजय पांडेय ने एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस के अनुसार उस दिन शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान में प्रस्तावित धरना-प्रदर्शन को लेकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस तैनात थी। सूचना मिली कि 200-250 लोगों की भीड़, जिनमें 28 नामजद आरोपी भी शामिल थे, प्लेकार्ड लेकर श्यामगंज चौराहे की ओर बढ़ रही है और भड़काऊ नारे लगा रही है।
पुलिस ने उन्हें बताया कि धरने की अनुमति नहीं है और धारा 163 बीएनएसएस के तहत निषेधाज्ञा लागू है, इसलिए वे लौट जाएं। एफआईआर के अनुसार पुलिस के समझाने के बावजूद भीड़ उग्र हो गई और पुलिस पर पत्थर, ईंट और एसिड से भरी बोतलें फेंकी गईं। कुछ लोगों ने पुलिस पर फायरिंग भी की, जिससे एक कांस्टेबल को गोली छूकर निकल गई और दूसरे को पत्थर लगने से चोट आई। मौके से 12 बोर के खाली कारतूस, टूटी बोतलें और अन्य सामग्री बरामद हुई।
याचियों की अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि घटना सुबह की बताई गई है, जबकि एफआईआर रात 11:55 बजे दर्ज की गई, जिससे स्पष्ट है कि मामला सोच-समझकर गढ़ा गया है। उन्होंने कहा कि 200-250 लोगों की भीड़ में से 28 व्यक्तियों की पहचान करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। कुछ याचियों ने दावा किया कि वे घटना के समय अन्य स्थानों पर थे और उन्हें व्यक्तिगत रंजिश या राजनीतिक कारणों से झूठा फंसाया गया है।
एक याची की ओर से यह भी बताया गया कि समान घटना से संबंधित एक अन्य एफआईआर पहले से दर्ज है, इसलिए दूसरी एफआईआर वैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है। हालांकि मामले पर विचार करते हुए कोर्ट ने माना कि एफआईआर में गंभीर और व्यापक हिंसा के आरोप हैं, जो कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को भी प्रभावित करने वाला मामला है। इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपियों की पहचान के संबंध में कहा कि चूंकि पुलिस कर्मियों का स्थानीय लोगों से संपर्क रहता है, इसलिए भीड़ में से कुछ व्यक्तियों की पहचान कर पाना असंभव नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया की घटना के समय अन्यत्र होने का दावा साक्ष्य के आधार पर ट्रायल में ही सिद्ध किया जा सकता है। एफआईआर निरस्तीकरण की कार्यवाही में इस पर विचार नहीं किया जा सकता। दूसरी एफआईआर के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि पहले दर्ज एफआईआर में घटना का केवल एक सीमित पहलू वर्णित है, जबकि वर्तमान एफआईआर पूरे घटनाक्रम का विस्तृत विवरण देती है, इसलिए इसे दूसरी एफआईआर नहीं माना जा सकता है।
