ऐसा था साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

आकाश में चंद्रमा और तारों (या ग्रहों) को देखने का रोमांच कुछ ऐसा है, जो दिल को छू लेता है। यह सिर्फ देखना नहीं, बल्कि महसूस करना है, जैसे ब्रह्मांड खुद आपको बुला रहा हो और आप उसकी विशालता में खो जाना चाहें। खासकर तब, जब चंद्रमा में कोई बदलाव आता है, तो वह दृश्य रोमांटिक, रहस्यमयी और जादुई लगता है। - डॉ. इरफान ह्यूमन, विज्ञान लेखक

भारत में चंद्र ग्रहण

भारत में साल का पहला चंद्र ग्रहण का प्रारंभ 3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे हुआ। इसकी पूर्णता का प्रारंभ शाम 4:34 बजे रहा, समाप्ति शाम 5:33 बजे हुई और संपूर्ण ग्रहण की समाप्ति शाम 6:48 बजे हुई, लेकिन देश के तमाम हिस्सों में बचा-खुचा चंद्र ग्रहण यानी आंशिक चंद्र ग्रहण ही दिखाई दिया।

वायरल तस्वीर (1)

अम्ब्रा और पेनअम्ब्रा

ग्रहण के दौरान दो छायाएं बनती हैं। पहली छाया को प्रच्छाया (अम्ब्रा) कहते हैं। सूर्य से दूर जाते-जाते यह छाया छोटी होती जाती है। यह ग्रहण की छाया का गहरा केंद्र होता है। दूसरी छाया को उपछाया (पेनअम्ब्रा) कहते हैं। सूर्य से दूर जाते-जाते उपछाया बड़ी होती जाती है। अर्थात उपछाया चंद्रमा की छाया का बाहरी भाग होता है। यह वह जगह है, जहां प्रकाश आंशिक रूप से ही अवरुद्ध होता है।

पूर्ण व आंशिक चंद्र ग्रहण

वायरल तस्वीर (2)

देश के कई हिस्सों में इस चंद्र ग्रहण को चंद्र उदय के साथ आंशिक रूप से देखा गया। अपने उदय के समय ही चंद्रमा हल्की लालिमा लिए नजर आया। ध्यान रहे, मुख्य छाया (अम्ब्रा), ग्रहण की अंधेरी, घनी छाया होती है। चंद्रमा इसमें पूरी तरह घुस जाए तो पूर्ण ग्रहण लगता है और चंद्रमा लाल-कॉपर रंग का हो जाता है अर्थात सूर्य की रोशनी पृथ्वी के वायुमंडल से होकर मुड़ती है और चंद्रमा पर लाल-भूरा रंग डालती है, इसे रक्त चंद्रमा (ब्लडमून) कहते हैं। वहीं उपछाया (पेनअम्ब्रा), ग्रहण की बाहरी हल्की छाया होती है। चंद्रमा इसमें गुजरने पर सिर्फ थोड़ा धुंधला या मंद दिखता है, कोई बड़ा रंग परिवर्तन नहीं होता। जैसा की इस बार आंशिक चंद्र ग्रहण के समय दिखाई दिया। 

पूर्ण चंद्र ग्रहण तब घटित होता है, जब पूरा चंद्रमा पृथ्वी की प्रच्छाया से आवृत हो जाता है तथा आंशिक चंद्र ग्रहण तब घटित होता है, जब चंद्रमा का एक हिस्सा ही पृथ्वी की प्रच्छाया से ढक पाता है। अर्थात जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया पृथ्वी पर पड़ती है, तब पूर्ण चंद्रग्रहण होता है। इस दौरान चंद्रमा लालिमा लिए दिखाई दिया, जिसे ब्लडमून कहा जाता है। इस बार पूर्ण चंद्र ग्रहण की घटना घटित हुई, लेकिन यह भारत के अधिकांश स्थानों पर चंद्रोदय के समय चंद्रग्रहण का समापन दिखाई दिया सिवाय उत्तर-पूर्वी भारत और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुछ स्थानों के, जहां ग्रहण के पूर्ण चरण का अंत भी दिखाई दिया। देश की कई वैज्ञानिक संस्थाओं के आह्वान पर बच्चों और बुजुर्गों ने इस खगोलीय घटना को नंगी आंखों से देखने का आनंद

क्या होती है ग्रहण ऋतु 

जब सूर्य वर्ष में दो बार चंद्रमा की कक्षा के उन बिंदुओं के निकट पहुंचता है, जिन्हें राहु और केतु (नोड) कहा जाता है, तब लगभग 35-35 दिनों की दो विशेष अवधियां बनती हैं। इन्हीं अवधियों को ग्रहण ऋ तु कहा जाता है। लगभग हर 173 दिन, यानी करीब छह महीने में, सूर्य एक नोड से दूसरे नोड के पास पहुंचता है और उसी समय यह ग्रहण ऋ तु बनती है।

इस अवधि में ग्रहण होने की संभावना अधिक रहती है। सामान्यतः इस लगभग 35 दिनों की खिड़की में पहले अमावस्या के दिन सूर्यग्रहण हो सकता है। इसके लगभग 15 दिन बाद पूर्णिमा आती है, जब चंद्र ग्रहण की संभावना बनती है। फिर करीब 15 दिन बाद अगली अमावस्या पर एक और सूर्यग्रहण संभव हो सकता है। इसलिए एक ही ग्रहण ऋ तु में अधिकतम तीन ग्रहण हो सकते हैं। इस प्रकार पूरे वर्ष में सामान्यतः छह ग्रहण तक हो सकते हैं, हालांकि विशेष खगोलीय परिस्थितियों में कभी-कभी सात ग्रहण भी संभव हो जाते हैं। 

वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण तभी संभव होता है, जब सूर्य चंद्र कक्षा के नोड से लगभग ±15 डिग्री के भीतर हो। सूर्य आकाश में प्रतिदिन लगभग 1 डिग्री आगे बढ़ता है, इसलिए नोड से 15 डिग्री पहले और 15 डिग्री बाद तक का क्षेत्र लगभग 30 डिग्री का होता है। इसी कारण यह अवधि लगभग 30 दिनों के आसपास बनती है। वास्तविक खगोलीय परिस्थितियों के कारण यह सीमा लगभग 31 से 37 दिनों तक भी हो सकती है। इसी औसत अवधि के कारण लगभग 35 दिनों की ग्रहण ऋ तु मानी जाती है, जिसके दौरान सूर्य और चंद्रमा की स्थिति ऐसी बनती है कि पृथ्वी से सूर्यग्रहण और चंद्र ग्रहण देखने की संभावना रहती है।