पुरुषार्थ : मानव जीवन का मूल्याधारित लक्ष्य-संधान

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Published By Anjali Singh
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यह धरा कर्मभूमि के नाम से जानी जाती है, जहां मनुष्य और पशु दोनों साथ-साथ विचरण करते हुए अपने-अपने प्रयोजनों की पूर्ति के लिए कर्म करते हैं, परंतु इन दोनों के कर्म में एक मौलिक अंतर है। पशु का कर्म स्वाभाविक, प्रवृत्तिजन्य और विवेकहीन होता है, जो जीवन-रक्षा और क्षुधा-पूर्ति तक सीमित रहता है, जबकि मनुष्य का कर्म विवेकयुक्त, मूल्याधारित और लक्ष्यपरक होता है। यही विवेकसम्मत कर्म पुरुषार्थ कहलाता है।-डॉ. रज्जन कुमार, सेवानिवृत्त प्रोफेसर

पुरुषार्थ का सामान्य अर्थ है, अपने उद्देश्य या अपेक्षा की पूर्ति हेतु किया गया सचेत प्रयास। पशु भी कर्म करता है, परंतु उसका कर्म जैविक आवश्यकताओं से आगे नहीं बढ़ता। इसके विपरीत मनुष्य का पुरुषार्थ उसकी जिजीविषा, चेतना और आत्मिक उत्कर्ष का प्रतीक है। मानव द्वारा किया गया पुरुषार्थ लौकिक और अलौकिक, भौतिक और आध्यात्मिक, नैतिक और धार्मिक सभी आयामों को समाहित करता है। इसी कारण उसका मूल्यांकन भी नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर किया जा सकता है।

भारतीय दर्शन में पुरुषार्थ को मानव जीवन का मूल लक्ष्य माना गया है। ‘पुरुषार्थ’ शब्द का अर्थ है- “पुरुष का उद्देश्य” अथवा “मानव का लक्ष्य”। शास्त्रों में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, जिन्हें ‘चतुर्वर्ग’ भी कहा जाता है। ये चारों मिलकर मानव जीवन को संतुलित, मर्यादित और सार्थक बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। मानव पुरुषार्थ विवेकहीन या लक्ष्यविहीन प्रयास नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने वाला सचेत उपक्रम है।
मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा चारों की संतुष्टि के लिए जो प्रयास करता है, वही पुरुषार्थ है। इन चार पुरुषार्थों में मोक्ष को अंतिम लक्ष्य माना गया है, जबकि धर्म, अर्थ और काम उसके साधन हैं। इनका संतुलित समन्वय ही पूर्ण मानव जीवन का आदर्श प्रस्तुत करता है।

धर्म चारों पुरुषार्थों का नियामक सिद्धांत है। धर्म वह मूल्य-सिद्धांत है, जो जीवन, समाज और सृष्टि के संतुलन को बनाए रखता है। इसका आशय नैतिक कर्तव्य, सदाचार, पवित्रता, स्वभाव और उचित आचरण से है। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं-क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय-निग्रह, विद्या, ज्ञान, सत्य और क्रोध पर नियंत्रण। धर्म मनुष्य में अच्छे-बुरे का विवेक जगाता है और कर्मफल के सिद्धांत को स्वीकार करता है। लोकमान्यता है कि पुण्य कर्म मृत्यु के बाद भी मनुष्य का साथ देते हैं।

अर्थ दूसरा प्रमुख पुरुषार्थ है, जिसका संबंध भौतिक साधनों और आवश्यकताओं की पूर्ति से है। अर्थ का अर्थ केवल धन या संपत्ति नहीं, बल्कि वे सभी साधन हैं, जो जीवन-निर्वाह और सामाजिक दायित्वों की पूर्ति में सहायक हों। पंचमहायज्ञ, दान, अतिथि-सत्कार, संतान-पालन और समाज-कल्याण जैसे कार्यों के लिए अर्थ आवश्यक है। गृहस्थ आश्रम में अर्थ अर्जन पर विशेष बल दिया गया है, परंतु शास्त्र यह भी कहते हैं कि धन का अर्जन नैतिक और धार्मिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए। आवश्यकता से अधिक धन को व्यक्ति अपना निजी स्वामित्व न मानकर समाज की अमानत समझे, यही अर्थ का आदर्श स्वरूप है।

काम तीसरा पुरुषार्थ है, जिसे प्रायः केवल भोग या यौन-इच्छा से जोड़ दिया जाता है, जबकि इसका अर्थ कहीं व्यापक है। काम मनुष्य की सभी इच्छाओं, अभिलाषाओं, भावनाओं और सौंदर्यबोध का प्रतिनिधित्व करता है। यह जीवन के आनंद का प्रतीक है- शारीरिक, मानसिक और रचनात्मक सभी स्तरों पर। साहित्य, संगीत, कला, नृत्य और प्रेम ये सभी काम के ही विस्तार हैं। काम व्यक्ति को मानसिक संतुलन प्रदान करता है और गृहस्थ जीवन में समाज की निरंतरता बनाए रखने में सहायक होता है। इच्छाओं की संतुष्टि के बाद ही व्यक्ति उनमें विरक्ति प्राप्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। मोक्ष चौथा और अंतिम पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ और काम के समन्वय से जब व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त करता है और अज्ञान के बंधनों से मुक्त हो जाता है, तब मोक्ष की अवस्था आती है। मोक्ष का अर्थ जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और आत्मा का परम सत्य से एकाकार होना है। यह अवस्था स्थायी आनंद, शांति और पूर्णता की अनुभूति कराती है।

शास्त्रों के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के तीन मार्ग हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। कर्मयोग निष्काम कर्म पर बल देता है, ज्ञानयोग आत्म-बोध और विवेक पर आधारित है और भक्तियोग प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। इनमें भक्तियोग को सर्वसुलभ और सरल माना गया है, जबकि ज्ञानयोग कठिन और कर्मयोग जीवन को परिष्कृत करते हुए भक्ति की ओर ले जाता है। पुरुषार्थ का महत्व इस बात में निहित है कि यह स्वार्थ और परमार्थ के बीच संतुलन स्थापित करता है। यह मनुष्य को न केवल व्यक्तिगत विकास की ओर ले जाता है, बल्कि सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्वों का बोध भी कराता है। धर्म जीवन को अनुशासित करता है, अर्थ आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, काम जीवन में आनंद भरता है और मोक्ष जीवन को परम लक्ष्य प्रदान करता है। इस प्रकार पुरुषार्थ मानव जीवन की वह सार्थक शक्ति है, जो सांसारिक सुखों के बीच भी धर्म के पालन द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संतुलित समन्वय ही मानव जीवन को पूर्ण, मूल्ययुक्त और अर्थवान बनाता है।