जंगल की दुनिया : छोटे शरीर में बड़ी सजा, बुलेट चींटी का डंक
मध्य और दक्षिण अमेरिका के घने वर्षावनों में पाई जाने वाली बुलेट चींटी (Paraponera clavata) को दुनिया के सबसे दर्दनाक डंक वाले कीटों में गिना जाता है। प्रसिद्ध कीट विज्ञानी जस्टिन श्मिट द्वारा विकसित श्मिट स्टिंग पेन इंडेक्स में इसका स्थान सबसे ऊपर है। स्वयं श्मिट ने इसके दर्द की तुलना “गरम कोयलों पर चलते हुए एड़ी में कील ठोंक दिए जाने” से की थी। इस डंक का असर केवल तीव्र पीड़ा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई मामलों में यह दर्द 24 घंटे या उससे अधिक समय तक बना रह सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि बुलेट चींटियां आक्रामक शिकारी नहीं होतीं। ये मुख्यतः ज़मीन और पेड़ों के निचले हिस्सों में रहती हैं और अपने डंक का उपयोग आत्मरक्षा के लिए करती हैं। इनका विष (venom) शिकार को मारने से ज़्यादा शत्रु को डराने और लंबे समय तक निष्क्रिय करने के लिए विकसित हुआ है। यही कारण है कि डंक के बाद दर्द तो अत्यधिक होता है, लेकिन स्थायी शारीरिक क्षति अपेक्षाकृत कम होती है।
इसी तरह, टारेंटुला हॉक ततैया, कुछ बिच्छू और अन्य विषैले कीट भी ऐसे रक्षात्मक तंत्र अपनाते हैं जिनका उद्देश्य मृत्यु नहीं बल्कि तीव्र, यादगार पीड़ा देना होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा दर्द शिकारियों के व्यवहार को लंबे समय तक बदल देता है—वे भविष्य में उस प्रजाति से दूरी बनाए रखते हैं।
इन कीटों के डंक पर किए गए अध्ययन हमें यह समझने में मदद करते हैं कि विकासक्रम (evolution) में दर्द किस तरह एक प्रभावी हथियार के रूप में उभरा। साथ ही, इन विषों के रासायनिक गुणों पर शोध से दर्द निवारण (pain management) और तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं। बुलेट चींटी और ऐसे अन्य कीट हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति में शक्ति हमेशा आकार या आक्रामकता में नहीं, बल्कि अनुभव कराए गए भय और दर्द की तीव्रता में भी निहित हो सकती है।
