आपबीती: संघर्ष की पाठशाला से सेवा के पथ तक

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Published By Anjali Singh
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आजमगढ़ की मिट्टी में पले-बढ़े सपने जब बागपत की धरती पर आकर जिम्मेदारी का रूप लेते हैं, तो यह सिर्फ स्थान परिवर्तन नहीं होता- यह वर्षों के संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की परिणति होती है। खंड शिक्षा अधिकारी के रूप में नौकरी का पहला दिन मेरे जीवन का ऐसा अध्याय था, जहां पीछे मुड़कर देखने पर मेहनत की लंबी पगडंडी दिखती थी और आगे सेवा की व्यापक राह।

बागपत स्थित कार्यालय में प्रवेश करते ही माहौल की गंभीरता महसूस हुई। फाइलों की आवाजाही, कर्मचारियों की व्यस्तता और दीवारों पर टंगी योजनाएं- सब कुछ मानो यह बताने के लिए पर्याप्त था कि यह पद केवल अधिकार का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का है। चारों ओर की निगाहें जिज्ञासु थीं। लोगों के मन में सवाल था, इतनी कम उम्र में खंड शिक्षा अधिकारी कैसे? उस क्षण समझ आया कि पद से पहले भरोसा अर्जित करना होता है और भरोसा केवल काम से बनता है। नौकरी के पहले दिन मन में मिश्रित भावनाएं थीं। 

एक ओर नई जिम्मेदारियों का डर, तो दूसरी ओर कुछ नया सीखने और व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने का उत्साह। यह उपलब्धि अचानक नहीं मिली थी। इसके पीछे प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी, कठिन और अनुशासनपूर्ण यात्रा रही है। तैयारी के दिनों में कई बार असफलताओं से सामना हुआ, कई बार खुद पर संदेह भी आया, लेकिन हर बार लक्ष्य ने फिर खड़ा किया। आज का तकनीकी युग प्रतियोगी परीक्षाओं को पहले से कहीं अधिक जटिल बना चुका है। 

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, डिजिटल अध्ययन सामग्री की भरमार, सोशल मीडिया पर तुलना और लगातार बदलते परीक्षा पैटर्न- इन सबके बीच ध्यान, धैर्य और निरंतरता बनाए रखना अपने आप में चुनौती है। तैयारी के दौरान अनेक अभ्यर्थियों, शिक्षकों और अधिकारियों से संवाद का अवसर मिला। इन संवादों ने न सिर्फ ज्ञान बढ़ाया, बल्कि प्रशासनिक सोच को समझने का दृष्टिकोण भी दिया। 

इस ताकत के पीछे जो सबसे प्रबल स्तंभ था वह मेरी मां के हौंसले और सपनों से बुना था और हर असफलता पर उन्होंने यही कहा कि छोटी असफलताएं बड़ी सफलता को प्राप्त करने की दिशा निर्धारित करती हैं बस धैर्य रखना पड़ता है। आज वह इस दुनियां में नहीं हैं, लेकिन उनके लालन-पालन व संघर्षमयी जीवन हमेशा एक नई ऊर्जा व सकारात्मक अभिप्रेरणा से नित नए कार्यों हेतु बल प्रदान करता है।

बागपत पहुंचकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था को करीब से देखने का अवसर मिला। यहां की समयबद्धता, अनुशासन और ज़मीनी स्तर पर काम करने की परंपरा ने विशेष रूप से प्रभावित किया। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और नवाचार की व्यापक संभावनाएं स्पष्ट दिखीं। पहले ही दिन यह एहसास हुआ कि अधिकारी होना लक्ष्य नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना उद्देश्य है। 

नौकरी का पहला दिन मेरे लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि एक संकल्प का आरंभ था—ईमानदारी से काम करने, सीखते रहने और शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प। यह कहानी उन युवाओं के लिए है, जो तकनीकी युग की चुनौतियों के बीच भी अपने सपनों पर भरोसा रखते हैं। शुरुआत कठिन हो सकती है, रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन यदि इरादा स्पष्ट हो और मेहनत निरंतर, तो मंज़िल अपने आप रास्ता दे देती है। अंत में स्वलिखित पंक्तियों से अपनी बात खत्म करता हूं-हवा ऐसी चली कि कोई समझ ही नहीं पाया ‘सूरज’... किसी को मिली ज़न्नत तो किसी के हिस्से दोजख़ आया।-सूरज कुमार सिंह, खंड शिक्षा अधिकारी, विकास खंड भागलपुर, देवरिया