अभिव्यक्ति की सशक्त विधा
भाषा हमारे पूर्वजों की अर्जित सामूहिक संपत्ति है। भाषा की उत्पत्ति हमारे पूर्वजों ने इसलिए की थी कि हम अपने गोपनीय मनोभावों का जो अदृश्य है, अज्ञात है, उसको सामने वाले तक पहुंचाया जा सके और साकार या दृष्य रूप में प्रस्तुत या उपस्थित किया जा सके। संदेशों का संप्रेषण किसी भी समाज में भाषा की उपस्थिति का मुख्य कारण रहा है। आज यह जरूर कहा जा रहा है कि जिस भाषा को हमारे पूर्वजों ने गोपनीयता के प्रकाशन के लिए तैयार किया था, आज उसी भाषा से हम अपने मनोभावों के गोपन का कार्य कर रहे हैं।
भाषा ने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों लोकों को प्रकाशित कर रखा है। भाषा में व्यक्त किए जा रहे अनुभवों एवं संवेदनाओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित-संरक्षित करने हेतु लिपि का पूर्वजों ने संज्ञान किया और भाषा को लिपिबद्ध किया। लिपिबद्ध होने पर भाषा के अंतर्गत बोलचाल या बातचीत के अतिरिक्त ज्ञान और संवेदनाओं के विस्तार के लिए ज्ञान के दो रूपों शास्त्र एवं साहित्य की परिकल्पना करते हुए विभिन्न प्रकार के शास्त्रों और साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य प्रारंभ किया गया।
भाषा का घनत्व और संपादकीय
वेदांग के नाम पर छह शास्त्रों से हमारे अध्ययन की शुरुआत आज छह सौ विषयों तक पहुंच चुकी है। वहीं पर साहित्य में महाकाव्य, खंडकाव्य, तुकांत -अतुकांत कविताएं और गद्य के क्षेत्र में निबंध, नाटक, एकांकी, ललित निबंध, रेखा चित्र, रिपोर्ताज, फीचर, संस्मरण, डायरी, पत्र , आत्मकथा, जीवनी, ब्लॉग जैसी विधाएं सामने आई हैं और निरंतर विकसित हो रही हैं। साहित्य और शास्त्र का विभाजन शब्द की अर्थ प्रक्रिया पर निर्धारित की गई है।
यदि शब्द से एक निश्चित अर्थ की प्राप्ति हो रही है और अर्थ विचलन नहीं है, तो उसे शास्त्र में प्रयुक्त किया गया और अर्थ की दृष्टि से इसे ‘विचारित सुस्थ’ कहा गया। शास्त्र में अभिधा अर्थ ही प्रथम और अंतिम है। जबकि साहित्य में अभिधा, लक्षणा, व्यंजना, तात्पर्य जैसे अर्थों की परिकल्पना करते हुए, उसे ‘अविचारित रमणीय’ नाम दिया गया है। इस अविचारित रमणीय अर्थों वाली दुनिया, जिसे हम साहित्य कहते हैं, जो विभिन्न विधाओं में है। उसमें भाषा का लिखित रूप अपने सर्वोत्तम रूप में संपादकीय में देखा जा सकता है। अर्थ की दृष्टि से भाषा का घनत्व संपादकीय का प्राणतत्व है।
लेखन जगत की अनिवार्यता
पत्र- पत्रिकाओं के प्रकाशन एवं पुस्तकों के संपादन के साथ ही ‘संपादकीय’ हमारे लेखन जगत की अनिवार्यता बन गई है। उदंत मार्तण्ड से लेकर अद्यतन दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, द्वैमासिक, त्रैमासिक, षट्मासिक, वार्षिक जैसी अवधिवाली पत्र-पत्रिकाओं में संपादकीय एक विशिष्ट सामूहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। संपादकीय में किसी भी संस्था, संगठन, संघ से संबंधित विचारधारा को पारदर्शी तरीके से कम से कम शब्दों में रखने का विधान किया गया है। संपादकीय के द्वारा शासन-सत्ता की चुनौतियों का सामना करते हुए संपादक स्थानीय ,राष्ट्रीय एवं वैश्विक समस्याओं पर अपने संस्थान के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का कार्य करता है।
लगभग ज्ञान को प्रकाशित करने वाले प्रत्येक अनुशासन में पत्रिकाएं निकल रही हैं। साहित्य में समग्रता को समेटते हुए और विधापरक पत्रिकाओं की भी प्रगति देखी जा सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई से लेकर आपातकाल तक संपादकों की दमदार संपादकीय देखी जा सकती है। आपातकालीन संपादकीय प्रयोगों की एक गौरवशाली शानदार श्रृंखला है। आज तक समस्याओं एवं चुनौतियों का जितना सामना संपादकीय के द्वारा किया गया है, उतना किसी अन्य विधा के द्वारा संभव नहीं हुआ है।
गौरतलब है कि भाषा के इस महत्वपूर्ण उपक्रम को अभी तक विधा की मान्यता नहीं दी गई है। हिन्दी साहित्य के इतिहासों से संपादकीय विधा का इतिहास गायब है। जब विधा माना नहीं गया तो इतिहास , उद्भव- विकास लिखने की आवश्यकता भी नहीं रह गई। चर्चित साहित्यिक पत्रिका हंस में गौतम नवलखा ने कई वर्ष पूर्व संपादकीय को एक विधा के रूप में मान्यता देने के लिए एक लेख लिखा था। हंस के ‘संपादकीय’ गद्य की किसी विधा से ज्यादा चर्चित रहे हैं। आलोचना, पूर्वाग्रह या पहले की पत्रिकाओं के संपादकीय से साहित्य की नीति तय हो जाती थी। आज भी बौद्धिक समाज और प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए संपादकीय कितनी महत्वपूर्ण हैं, यह बात हम सब जानते हैं।
संपादकीय गद्य की अप्रतिम, अद्वितीय, अनन्य विधा है। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में कुलपति महोदय की कुशल निर्देशन के द्वारा अकादमिक क्षेत्र में यह नवाचार संभव हो सका है। हिन्दी जगत के यशस्वी रचनाकार आचार्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी द्वारा संपादित ‘दस्तावेज’ त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का एक संपादकीय ‘शब्द और कर्म’ पाठ्यक्रम में लगाया गया। संपादकीय जगत के इतिहास में यह संपादकीय अद्भुत स्थान रखता है।
संपादकीय का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। संपादकीय के विभिन्न रूप विषय और समय गत पत्र-पत्रिकाओं में देखे जा सकते हैं। संपादकीय के तकनीकी पक्षों का अध्ययन अध्यापन होता रहा है, किंतु अब संपादकीय विधा के उद्भव और विकास पर भी विद्वानों का ध्यान गया है। अब इस विधा का भी समग्रता से इतिहास प्रस्तुत किया जाएगा।प्रो.शैलेन्द्र नाथ मिश्र, पूर्व संयोजक हिन्दी अध्ययन मंडल मां पटाटेश्वरी विश्वविद्यालय बलरामपुर, उत्तर प्रदेश।
