आदिवासी लोक चित्रकला को देखने का बदलना होगा नजरिया

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Published By Anjali Singh
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यह भी एक रोचक तथ्य है कि जिस प्रकार नगर कला पिछली सदियों में अनेक कला आंदोलनों एवं वैचारिक द्वंद्वों से गुजरती हुई अपने समकालीन रूप तक पहुंची है, इसी प्रकार लोक-आदिवासी कला भी अनेक धार्मिक-सामाजिक परिस्थितियों से गुजरती हुई अपने वर्तमान रूप तक पहुंची है। डब्ल्यू. जी. आर्चर, वेरीयर एल्विन एवं अन्य विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किए गए पश्चिम बंगाल के पटुआ पटचित्र, ओडिशा के जात्री पटचित्र, महाराष्ट्र के चित्रकथी पोथी चित्र, सौंरा आदिवासियों के इडीतल भित्ति चित्र एवं बिहार के मधुबनी के भित्तिचित्र आदि के जो पुराने नमूने हैं, वे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध अथवा बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों के हैं। इनका स्वरूप वर्तमान में इन्हीं शैलियों के प्रचलित लोक चित्रों से बहुत भिन्न है।  - मुस्ताक खान

आदिवासी लोक चित्रकला का व्यवसायीकरण

आदिवासी लोक चित्रों का एक रूप सन् 1960 के दशक में तब सामने आया, जब पारंपरिक लोक-आदिवासी चित्रकला के व्यवसायीकरण के प्रयास आरंभ हुए। उस समय पहली बार आदिवासी लोक चित्रकला में बाहरी विद्वानों द्वारा वैचारिक हस्तक्षेप आरंभ हुआ। पारंपरिक लोक चित्रकारों को यह समझाया गया कि उन्हें दीवार के बजाय कागज पर चित्रकारी करनी है तथा नए विषयों को सीमित आकार में चित्रित करने का प्रयास करना है। कुछ ही समय में सामग्री और तकनीक भी बदलवाई गई। इन प्रयासों के साथ ही पारंपरिक आदिवासी लोक चित्रकला के स्वरूप में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुए। इससे पहले तक इसमें सामूहिकता एवं परंपरा के निर्वाह और उसकी पवित्रता तथा परिशुद्धता का महत्व सर्वोपरि था। लोक चित्रकार की व्यक्तिगत प्रतिभा और कल्पनाशीलता का स्थान गौण था। लोक चित्रकार की हेसियत पिंजरे में बंद पक्षी जैसी थी, परंतु अब उसे अपने पर खोलने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।
 
सन 1960 के दशक तक की आदिवासी लोक चित्रकला को मैंने कुछ इस तरह समझा- अपने परंपरागत स्वरूप में आदिवासी लोक चित्रकला क्षेत्र विशेष या समुदाय विशेष के जन-सामान्य द्वारा किया गया वह कलाकर्म है, जिसके मूल में शुभ का विचार होता है और जो अवसर विशेष से जुड़े अनुष्ठान एवं मान्यताओं को संपन्न करने हेतु किया जाता है। मूलतः यह कलाकर्म आजीविका कमाने हेतु नहीं, बल्कि अपने जीवन को प्रचलित विश्वासों और मान्यताओं के अनुरूप सुख एवं शांतिमय बनाने हेतु पारलौकिक शक्तियों से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह चित्र मानव का देवी-देवताओं को संबोधन है। यह चित्रित प्रार्थनाएं हैं, जिनके माध्यम से वे इस लोक एवं परलोक के मध्य संवाद स्थापित करते हैं। अपने इष्ट देवी-देवताओं का आह्वान करते हैं, उन्हें जाग्रत करते हैं, उन्हें शांत करते हैं, उनका धन्यवाद ज्ञापन करते हैं और उनकी आराधना करते हैं। यह चित्र मात्र प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि आदिवासी-लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं। 

पारंपरिक परिभाषा पर उठते प्रश्न

वर्तमान में, इक्कीसवीं सदी के परिवेश में प्रचलित आदिवासी लोक चित्रकला को क्या उसकी इस परिभाषा अथवा उसके प्रति इस पारंपरिक सोच से व्याख्यायित किया जा सकता है? मेरे लिए यह एक विचारणीय प्रश्न है। क्या हमें अब प्रचलित आदिवासी लोक चित्रकला के समकालीन रूप को नए सिरे से समझने और परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है? आदिवासी लोक चित्रकला का एक बड़ा भाग जो वर्तमान में शहरी कला बाजारों अथवा प्रदर्शनियों तथा इंटरनेट पर दिखाई देता है, वह उपरोक्त पारंपरिक परिभाषा से बहुत आगे जा चुका है। अब इन्हें बनाने के लिए न तो किसी विशेष अवसर की आवश्यकता है, न अनुष्ठान, त्योहार की और न ही इनके द्वारा किसी देव का आह्वान किया जाता है और न ही शमन। यह चित्र अपने पारंपरिक सामाजिक संदर्भ अथवा उत्तरदायित्व से मुक्त होकर केवल सौंदर्य सृजन एवं अर्थोपार्जन का माध्यम बन चुके हैं। ऐसा भी नहीं है कि समूचा परिदृश्य बदल गया हो, आज भी आंतरिक ग्रामीण अंचलों में कहीं-न-कहीं यह चित्र अपनी पारंपरिक पहचान और कलेवर बनाए हुए हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि लोककला की स्थिति अब बदल चुकी है। 

शहरी कला बाजार और चित्रों का नया स्वरूप

आदिवासी लोक चित्रों के इस समकालीन समूह में वे सभी चित्र सम्मिलित हैं, जिनका प्रचलन पारंपरिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु नहीं, बल्कि शहरी बाजारों में विक्रय हेतु बनाए जाने के साथ विकसित हुआ है। यह चित्र आदिवासी-लोक कलाकारों के परंपरा-सिंचित सौंदर्यबोध एवं उनकी व्यक्तिगत कला प्रतिभा की अभिव्यक्तियां हैं। इन चित्रों ने आदिवासी-लोक कलाकारों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं एवं आदिवासी-लोक कला को एक भिन्न धरातल पर प्रतिष्ठित कर दिया है। सामान्यतः आदिवासी-लोक चित्रकला को हम इनकी परंपरा के परिप्रेक्ष्य में ही देखते रहे हैं। रूपंकर कलाओं के संदर्भ में परंपरा का आशय केवल प्रचलित चित्रभाषा, अभिप्राय, प्रतीक, छवियां, रूपाकार, शैली आदि की पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं रहता बल्कि इनमें सतत प्रवाहित जनचेतना का भी अपना महत्व है, जो इन्हें बदलते परिवेश में भी अपने मूल से जोड़े रखती है। इस समूचे परिदृश्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आदिवासी-लोक समाजों में कलाकारों का योगदान यही है कि वे इन परंपरागत कलाकृतियों को अपनी कलात्मक प्रतिभा से समकालीन रूप तथा महत्व प्रदान करते हैं।

मौलिक कला प्रतिभा और शिल्प कौशल

आदिवासी लोक कला के व्यवसायीकरण की प्रक्रिया का एक परिणाम यह हुआ कि अब तक सामुदायिक अथवा सामूहिक समझी जाने वाली आदिवासी लोक कलाओं में कलाकारों के काम को व्यक्तिगत पहचान मिलना आरंभ हुआ। कलाकारों को अपनी सामुदायिक कला परंपरा के प्रतिनिधि के साथ-साथ एक निजी पहचान भी मिली। सामूहिक कलाकर्म में व्यक्ति का उदय हुआ। पारंपरिक ढर्रे पर कलाकर्म करते हुए कलाकार की व्यक्तिगत कला प्रतिभा को पहचान मिली, लेकिन आदिवासी लोक कलाकारों की यह यात्रा इतनी आसान नहीं रही। बदलते परिवेश में उनके कलाकर्म का उद्देश्य ही बदल रहा था। अब उन्हें अपने पारंपरिक चित्रों में धार्मिक-सामाजिक विश्वासों के अनुरूप पवित्रता नहीं बनाए रखनी थी, बल्कि उन्हें अपनी पारंपरिक शैलीगत पहचान बनाए रखते हुए निजी मौलिक कला प्रतिभा और शिल्प कौशल को व्यक्त करना था। अब वे समुदाय से निकलकर कला के बाज़ार में प्रवेश कर गए थे। उन्हें अब अपनी कल्पना को विस्तार देना था और नए-नए विषयों पर चित्रों का सृजन करना था। 

आदिवासी लोक कला को देखने का एक अलग नजरिया मिला सन् 1980 में, जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत भवन की स्थापना के साथ एक नए कला आंदोलन ने जन्म लिया। प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलाचिंतक जगदीश स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में यह एक ऐसा कला आंदोलन था, जो शहरी समकालीन और ग्रामीण आदिवासी लोक कला को एक साथ भारतीय समकालीन कला के दो अभिन्न अंग मानता था। यहां आदिवासी लोककला भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी शहरी आधुनिक कला। यहां परंपरा का अर्थ केवल पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसमें निजता और नवीनता का सहज स्वीकार था।

असीम संभावनाएं

परिणामस्वरूप पारंपरिक आदिवासी लोक कला पर पारंपरिक पवित्रता के आग्रह की जकड़ कम होने से आदिवासी लोक कलाकारों को चित्र सृजन में उसका कथ्य और रूप कल्पित करने में अपेक्षाकृत स्वतंत्रता मिलने लगी। परंतु उन पर यह जिम्मेदारी भी आ पड़ी कि वे अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता को उसी सीमा तक ले जाएं, जहां तक उनकी पारंपरिक शैलीगत पहचान विलुप्त न होने पाए। भले ही आदिवासी लोक कलाकारों को अपनी-अपनी समुदायगत विरासत में मिली परंपरा ने उन्हें कृति सृजन के लिए समान विषयवस्तु प्रदान की है या उनका सौंदर्यबोध एक ही परंपरा द्वारा सिंचित है। 

परंतु उनकी व्यक्तिगत कल्पनाशीलता, रंग और रूप के प्रति सहज प्रतिक्रिया, कलाकार की निजी संवेदना आदि अनेक तत्व हैं, जो उनके कलाकर्म को न केवल प्रभावित करते हैं, बल्कि उसे विशिष्टता भी प्रदान करते हैं। तब एक पारंपरिक निश्चित दायरे में काम करते हुए भी असीम संभावनाएं उभरकर सामने आती हैं, जो इन कलाकृतियों में आदिवासी लोक कलाकारों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को रेखांकित करती हैं। आज अनेक आदिवासी लोक चित्रकारों ने अपनी चित्रकला की परंपरागत पहचान बनाए रखते हुए भी, अपनी व्यक्तिगत सृजनशीलता से इस पारंपरिक कला में नए आयाम जोड़े हैं, अपनी पहचान बनाई है। अतः हमें भी समकालीन आदिवासी लोक कला को देखने और समझने के नजरिये में वांछित बदलाव की जरूरत है। आई.टी.एम. यूनिवर्सिटी, ग्वालियर ने आदिवासी लोक कला की धारा के इस बदलाव की इस बयार को पहचाना है और इसे मुखरित होने के अवसर जुटाए हैं।