तमाशा : जीवंत लोक-नाट्य परंपरा

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Published By Anjali Singh
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तमाशा लोक नृत्य और नाट्य प्रस्तुति का एक विशिष्ट रूप है, जिसकी उत्पत्ति 16वीं शताब्दी के आरंभ में महाराष्ट्र में मानी जाती है। अपने आरंभिक दौर से लेकर आज तक तमाशा न केवल महाराष्ट्र, बल्कि भारत के सबसे लोकप्रिय और जीवंत लोक कला रूपों में गिना जाता है। यह लोकनाट्य संगीत, नृत्य, अभिनय और कविता का ऐसा संगम है, जो जनसाधारण की भावनाओं को सीधे अभिव्यक्त करता है।

तमाशा की प्रस्तुति में गायन और नृत्य के साथ कई पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इनमें ढोलकी, तुनतुनी (एक तार वाला वाद्ययंत्र), मंजीरा, डफ, हल्गी, कड़े नामक धातु का त्रिकोण, लेजिम, हारमोनियम और गुंघरू प्रमुख हैं। ढोलकी और हल्गी की सशक्त ताल तमाशा की पहचान मानी जाती है, जो पूरी प्रस्तुति को ऊर्जा और लय प्रदान करती है।

तमाशा का गहरा संबंध महाराष्ट्र के कोल्हाटी और महार समुदायों से रहा है। इन समुदायों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कला को जीवित रखा गया। तमाशा का इतिहास अन्य मराठी लोक कलाओं से भिन्न है, क्योंकि इसमें लोककथाओं, कविता और नाट्य का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में नृत्य और संगीत की परंपरा का प्रभाव तमाशा में स्पष्ट रूप से झलकता है। मराठी लोक साहित्य पर संस्कृत साहित्य का गहरा प्रभाव भी इसकी रचनात्मकता को समृद्ध करता है।

राम जोशी (1762-1812) को तमाशा का जनक माना जाता है। वे संस्कृत पुराणों, कीर्तन और नाट्य गायन के लिए प्रसिद्ध थे। बाद में मराठी साहित्यकार मोरोपंत के साथ उनके जुड़ाव ने तमाशा को नई दिशा दी। ‘शाहिर’ कहलाने वाले कवि-गायक रवानी ने तमाशा के लिए अनेक प्रेम और लोकगीतों की रचना की, जिससे यह कला और अधिक लोकप्रिय हुई।

तमाशा के दो अन्य रूपों- पारंपरिक पड़ा गायन और दशावतार नाट्य रूप का भी उल्लेख मिलता है। यह कला महाराष्ट्र के साथ-साथ कर्नाटक, गोवा और कोंकण क्षेत्रों में भी प्रचलित है। तमाशा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए किसी विशेष मंच की आवश्यकता नहीं होती। गांव का चौक, घर का आंगन या खुला मैदान—हर स्थान इसका रंगमंच बन सकता है। संगीतकारों के प्रवेश से आरंभ होने वाला तमाशा आज भी लोक-संस्कृति की जीवंत धड़कन बना हुआ है।