खौज: ऐसे हुआ मोबाइल का आविष्कार
1970 के दशक में अमेरिका की प्रतिष्ठित शोध संस्था बेल लैब्स में एक ऐसी अवधारणा पर प्रयोग शुरू हुए, जिसने भविष्य की संचार दुनिया की दिशा ही बदल दी। शोधकर्ताओं का विचार था कि पूरे देश को षट्भुजाकार (हेक्सागोनल) सेल के एक विशाल नेटवर्क से ढक दिया जाए। प्रत्येक सेल में एक बेस स्टेशन होगा, जो रेडियो आवृत्तियों के माध्यम से मोबाइल फोन से संदेश भेजेगा और प्राप्त करेगा। तकनीकी चतुराई यह थी कि दो आसन्न सेल अलग-अलग आवृत्तियों पर काम करें, ताकि सिग्नल हस्तक्षेप की समस्या न आए।
ये बेस स्टेशन रेडियो सिग्नलों को मुख्य दूरसंचार नेटवर्क से जोड़ते थे और जैसे ही कोई उपयोगकर्ता एक सेल से दूसरे सेल में प्रवेश करता, उसका फोन स्वतः ही फ्रीक्वेंसी बदल लेता। इस निर्बाध हैंडऑफ की कल्पना उस समय क्रांतिकारी थी। 1970 के दशक के अंत तक बेल लैब्स का एडवांस्ड मोबाइल फोन सिस्टम (एएमपीएस) छोटे पैमाने पर सफलतापूर्वक चालू हो चुका था, जिसने व्यावहारिक सेलुलर नेटवर्क का रास्ता खोल दिया। इसी दौर में मोटोरोला में कार्यरत इंजीनियर मार्टिन कूपर एक अलग ही सपने को साकार करने में जुटे थे। वे टीवी सीरीज़ स्टार ट्रेक के कम्युनिकेटर से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक ऐसा पोर्टेबल फोन बनाने का लक्ष्य तय कर लिया, जिसे हाथ में लेकर कहीं भी बात की जा सके। कूपर की टीम ने पहला हैंडहेल्ड मोबाइल फोन विकसित किया, जो बेल के एएमपीएस नेटवर्क से कनेक्ट हो सकता था।
1984 में मोटोरोला ने इस सपने को ‘डायनाटैक’ के रूप में बाजार में उतारा। एक किलोग्राम से अधिक वजन वाले इस फोन को प्यार से ‘द ब्रिक’ कहा गया। कीमत आज के हिसाब से लगभग 10,000 डॉलर थी, इसलिए यह आम लोगों की पहुंच से बाहर रहा, लेकिन अमीर फाइनेंसरों और उद्यमियों के बीच यह जल्द ही स्टेटस सिंबल बन गया। 1987 की फिल्म वॉल स्ट्रीट ने डायनाटैक को धन और लालच के प्रतीक के रूप में अमर कर दिया, जब माइकल डगलस द्वारा निभाया गया गॉर्डन गेको समुद्र तट पर टहलते हुए इसी फोन पर बात करता नजर आया। यहीं से मोबाइल फोन सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि आधुनिक शक्ति और महत्वाकांक्षा का प्रतीक भी बन गया।
वैज्ञानिक के बारे में
मार्टिन कूपर को भले ही दुनिया मोबाइल फोन के जनक के रूप में जानती हो, लेकिन उनकी निजी जिंदगी उतनी ही संतुलित, प्रेरक और मानवीय रही है। उनका जन्म 26 दिसंबर 1928 को अमेरिका के शिकागो शहर में हुआ। एक यहूदी प्रवासी परिवार में पले-बढ़े कूपर ने बचपन से ही पढ़ाई और तकनीक में गहरी रुचि दिखाई। उनकी निजी ज़िंदगी में सबसे अहम भूमिका उनकी पत्नी आर्लीन हैरिस (Arlene Harris) की रही।
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आर्लीन स्वयं भी एक प्रतिष्ठित इंजीनियर और उद्यमी हैं और उन्हें वायरलेस टेलीफोन सिस्टम के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। मार्टिन कूपर का निजी जीवन दिखावे से दूर रहा। वे कभी भी केवल प्रसिद्धि या धन के पीछे नहीं भागे। उनका मानना था कि तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र बनाना है, न कि उसे मशीनों पर निर्भर करना। यही सोच उनकी जीवनशैली में भी झलकती है, सादा जीवन, गहरी सोच और भविष्य को लेकर आशावादी दृष्टिकोण।
