आग राग गाता मदमाता आया फागुन
आसमान का रंग बदला और धरती खिलखिला उठी। ऋतु ने अंगड़ाई ली, प्रकृति मुस्कुराई। धूप थोड़ी तपी तो ढेरों फूल खिले। कूक-कूक कर हूक उठाती कोयल की पंचम तान प्राणों को सुलगाती अंग-अंग में आग जगाने लगी। दबी आग किस अनुराग से जगती है यह बसंत को पता है। बाग-बगीचों में, दूर सुदूर खेतों में, नदी तालाब के कूल कछारों में, हरे-हरे पत्तों, डालियों और रंग-बिरंगे फूलों की नरम-नरम पंखुड़ियों पर कोमल मुलायम मखमली आग तैरने लगी -
तन मन यौवन जल रहा,जले फाग की आग।
जमकर आज दिगंत में, गुंजे आग का राग।।’
दिग्वधुओं ने अपने घूंघट उठा लिए। लाज के अंदाज बदल गए। पेड़ों ने साज संभाला। लताओं ने पाजेब पहन ली। जीवंतता से भर गया जर्रा जर्रा। जड़ में चैतन्य क्या उतरा कि कंकड़ कंकड़ में शिवशंकर नाच उठे। भूत-प्रेत-बैताल भी साज सज्जा में सुसज्जित हो रंग गुलाल उड़ाने लगे। बाबा बौड़म अघोरेश्वर देवाधिदेव महादेव आशुतोष भूत भावन भोलेनाथ बारात लेकर निकल पड़े।
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वसंत का राग-अनुराग शिव की बारात में रंग-गंध की तरंग लिए जा घुसा। रागी-विरागी योगेश्वर शिव लय के आरोह-अवरोह से पोर-पोर झंकृत हुए, तो उनके पांवों में थिरकन उतर आई और वे उमंग में लगे नाचने। वसंत ने अनंत शिव में असीम ऊर्जा का संचार किया तो वे नटराज हो गए और जब वसंत ने उन्हें मदन-रूप में उन्मत्त करना चाहा तो रौद्र रूद्र बनकर, उन्होंने प्रलयंकारी तांडव का धमाल मचाया। वसंत छंद बनकर कंठहार होता है, तो बेतरतीब होकर अंगार भर रह जाता है। लास्य और तांडव का संतुलन है वसंत। सलीके से वसंत को संभाल लेने का उन्नत अवसर महाशिवरात्रि है। महाशिवरात्रि शिव-शक्ति के महामिलन का विराट आध्यात्मिक पर्व है।
वसंत फागुन की अगवानी करता हर दिशा में दमक रहा है। रंग-तरंगों पर मंद-मंद लहराती मलय बयार, टेसू के फूलों से फूटती लाल-लाल बौछार, पिक पंचम की उल्लसित ज्वार। ऐसे में भला कैसे न झरना हुआ मन सागर हो जाए। पूरा का पूरा वासंती परिवेश है। खुशबू से भरी झूमती हवाएं, बहकती हुई दिशाएं। आम पर बौर लद गए, पीपल के पत्तों में चमक बढ़ गई। गेहूं की बालियां निखरने लगीं, महुए की मादकता बिखरने लगीं। बलखाती लहराती नदियों को सूरज की किरणों ने चूमा तो वह लहर-लहर पर चमक उछालती कौंधने लगीं। अपने आप ही सबकी चाल बहकी, हर गाल बिना गुलाल मले ही गुलाबी हो गए, अनजाने ही मद में पद डगमग-डगमग होने लगे। आसमान मदहोश मुस्कुराहटों से धरती को निहारने लगा तो धरती भी निहाल हुई और सरसों के पीले फूलों की पिचकारियां मारने लगी। उड़ने लगी बहुरंगी तितलियां, मचलने लगे भौंरे, गाने लगी चिड़ियां। अंग अंग में तैरने लगा सुरीला नशा, पूरे वातावरण में फैल गया सुरूर और मृदुल गुदगुदाहटों से मादक हो उठा अंतरिक्ष। आक्षितिज आलोड़ित होने लगा अनकहे आस्वाद का अद्भुत आलोक। ऐसा आलोक जिसमें अदृश्य है रंग ही रंग, गंध ही गंध, संगीत ही संगीत। कुछ भी अछूता नहीं रहा। जड़ चेतन सब स्पंदित उद्वेलित हो उठे। लय की
लहरियों पर तरंगित होता हुआ प्रेम
पुलकित पैंगें मारता फागुन आ गया। -
‘फागुन ने अंकित किया,प्यार प्यार बस प्यार।
प्यार नाम है जिंदगी, प्यार धरा का हार।।’
शिव-शक्ति को संयोजित करता वसंत रंग गंध की पालकी उठाए फागुन का अलख जगाने लगा। ‘नव गति नव लय ताल छंद नव’ पर जब सब मदहोश होने लगे तो फागुन ने कोयल-स्वर में मधुर शोर मचाना शुरू किया। तब भी मदहोशी नहीं टूटी, तो फागुन ने पेड़ों पर मंजरियों की आग जला दी। टेसू और पलाश के फूल दहक उठे। फागुन ने आग की लपटें उठाई तो आकुल आह्लाद के उन्मादी स्फुलिंग उड़ने लगे। फागुन के अग्नि-अंक में समाहित होने लगा अस्तित्व। कुटिलता की होलिका जलकर राख हो गई और आह्लाद का प्रह्लाद अलौकिक रंग-गंध में डूबकर उबर आया। आह्लाद, आनंद और आत्मीयता का फागुनोत्सव परम सत्ता को भी ऐसा छू गया कि दिगंबर शिव मसान में ही मगन मस्त हो खेलने लगे होली। वसंत की मादकता और फागुनी उल्लास से उन्मादित हुआ कामदेव तो उसने दिगंबर शिव पर ही संधान कर दिया अपना मदन-बाण। काम के बाण से विद्ध हो शिव उन्मत्त नहीं हुए उद्धत हुए और लगे क्रोध में नाचने। ब्रह्मांड के सबसे बड़े प्रेमी शिव। उन्होंने अपने प्रेम की अक्षुण्णता और अखंडता के लिए काम को भस्म कर दिया। एक दूसरे में अंतर्भुक्त शिव और शक्ति काम रहित कामजित हैं। वसंत और फागुन कामोद्वेलन के समस्त द्वंद्वों से परे कामोद्दीपक अलौकिक ऊर्जा हैं। फागुन की मस्ती होली के रूप में व्यक्त होती है। भारतीय समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में योगीराज शिव और योगेश्वर कृष्ण में सन्निहित फागुनोत्सव के असीम प्रवाह और अनंत उल्लास के दर्शन हमारे चित्त की निर्मलता और भाव के औदात्य के परिचायक हैं। शिव और कृष्ण दोनों प्रेमी हैं। असीम, अनंत, अटूट, अखंड, अछोर और अनीह है दोनों का प्रेम। प्रेम की पराकाष्ठा और दिव्यता में डूबे शिव और कृष्ण शाश्वत हैं। शाश्वत है वसंत और शाश्वत है फागुन भी। -
‘प्रेम अनोखा रंग है , प्रेम अनोखा छंद।
फागुन ने चिल्ला कहा,इसको दिया अनंत।।
अहर्निश अनंत राग गाता अंबर और धरती के बीच अनुराग से भरा हुआ जो शून्य है वह अनछुआ, अनदेखा, अनकहा और अलौकिक है। जाने कब से सौंदर्य का अदृश्य सागर लगातार लहरा रहा है धरती और अंबर के बीच। धरती और अंबर के बीच ही जीवन और मरण का महारास चलता रहता है। यह शून्य ही ब्रह्म और जीव का सम्मोहक क्रीडा स्थल है। माया का खेल चल रहा है निरंतर। रंग और गंध का आनंद उत्सव मनाता आग राग गाता मदमाता फागुन आया है। फागुन के आते ही आए हैं अनेकानेक भाव विभाव अनुभाव। आई हैं अंतश्चेतना में अनंत अनुभूतियां।
वसंत और फागुन को अंतर में समाहित कर हम प्रार्थना करें कि इन अनुभूतियों की आग में असीम करुणा समाहित हो और राग अनुराग की ऐसी लय संपूर्ण विश्व में फैल जाए, जिसमें सब रंग-गंध के प्रेमपुलक में डूब एकरस एकतान हो जाएं। कोई किसी से विलग नहीं हो और फाग-आग के राग में ऐसे लहराएं कि एक दूसरे के अस्तित्व को कोई विलग भी नहीं कर सके। फागुन का संदेश है कि हम शुद्धआत्मा प्रबुद्ध बनें और हर युद्ध के विरुद्ध करुणा का ध्वजारोहण करें।
‘होली में सबको मिले, हंसी-खुशी सौगात।
सराबोर दिन रंग में, गंध भरी हो रात।।
-संजय पंकज, वरिष्ठ लेखक
