जॉब का पहला दिन: जिम्मेदारी की दहलीज पर पहला कदम

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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20 दिसंबर 2010 का दिन था, जब मुझे पहली बार स्थायी तौर पर अपनी प्रथम नियुक्ति के विद्यालय प्राथमिक विद्यालय जाहिदपुर, शाहबाद, रामपुर में जाना था। मेरा जन्मदिन 24 दिसंबर को होता है। इस प्रकार से दिसंबर में सरकारी सेवा में आना एक प्रकार से जन्मदिन के पूर्व उपहार जैसा था। मैंने जीवन में कभी कोई ट्यूशन तक नहीं पढ़ाई थी। बस बीएड और विशिष्ट बीटीसी के प्रशिक्षण के दौरान, जो शिक्षण अनुभव था वही था। ऐसे में जब पहली बार विद्यालय पहुंचा, तो वास्तविक परिस्थितियां किताबी ज्ञान से अलग और चुनौतीपूर्ण थीं। 

इन परिस्थितियों ने मुझे जहां जीवन की सच्चाइयों से रूबरू करवाया, मुझे तपाया वहीं मुझे मजबूत भी किया। विद्यालय में बिताया गया हर एक पल मेरे अनुभव को पुख्ता कर रहा था। मैं धीरे-धीरे इन चुनौतियों से लड़ना और मुस्कराकर हर समस्या का हल ढूंढना सीख गया। परिषदीय विद्यालयों में होने वाली दैनिक प्रार्थना ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे’ ने मुझे बहुत हिम्मत प्रदान करी। जब इस प्रार्थना को प्रतिदिन सुनता था। तब मन में एक ही बात आती थी कि ‘हम दीन दुखी निबलों विकलों के सेवक बन संताप हरे’ क्योंकि इस राह पर चलेंगे तभी तो ‘उनको तारें खुद तर जावें’ वाली पंक्ति सत्य सिद्ध होगी।  पदोन्नति के बाद 2016 में बरेली में स्थानांतरण भी हो गया। 2016 से अब तक मैं उच्च प्राथमिक विद्यालय रहटुइया, मझगवां, बरेली में कार्यरत हूं। रामपुर में मैं कक्षा 1- 5 तक के बच्चों को पढ़ाता था, तो यहां कक्षा 6 से 8 के बच्चों को शिक्षित करने लगा और इनमें प्रतियोगिता की भावना का संचार किया। 

परिणामस्वरूप वर्ष 2023 और 2025 में राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित छात्रवृत्ति जैसी कठिन प्रतियोगिता में विद्यालय से छात्र सफल हुए और 2026 में भी दो छात्रों के सफल होने की संभावना है। विद्यालय और बच्चों से मुझे इतना प्रेम है कि 2024 में ‘भूतिया मास्साब’ नाम का उपन्यास लिखा है जिसमें एक ऐसे अध्यापक की कहानी है जो मृत्यु के बाद भी भूत के रूप में अपने बच्चों की सहायता करते रहते हैं। हिन्दी फंतासी जो लगभग अछूता क्षेत्र है उसमें मैं ‘हाथिस्तान’ नाम की शृंखला लिख रहा हूं।-प्रांजल सक्सेना शिक्षक, बरेली

 

 

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