एक खत के जरिए छलका पलायन का दर्द
प्रिय भाई, मैं आशा करती हूं कि तुम अपने परिवार के साथ दिल्ली में कुशलता से और प्रसन्न होगे। पिछले दिनों धुमाकोट के पड़ोसियों से पता चला कि मां जी और बाबूजी दोनों का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं चल रहा है। आसपास के लोग यथासंभव उनकी देखभाल कर रहे हैं। मैं पीरुमदारा में रहते हुए भी बराबर उनका हाल-चाल लेती रहती हूं, फिर भी मन आशंकित रहता है। तुम्हें भी उनकी तबीयत के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए और समय निकालकर उनसे फोन पर बात किया करो। यह बात मैं पहले भी कह चुकी हूं।
इस वर्ष पहाड़ों में अधिक वर्षा के कारण मौसम कुछ ज्यादा ठंडा हो गया है और आने वाले दिनों में ठंड और बढ़ेगी। पिताजी को कफ की शिकायत रहती है, खासकर जाड़े के दिनों में, जिससे उनका अस्थमा बढ़ जाता है। वहीं वात रोग के कारण मां जी के दाहिने घुटने में सूजन आ गई है। मेरा मन नहीं माना और मैं उन्हें देखने गांव पहुंच गई। मुझे देखकर मां जी और बाबूजी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने भावुक होकर कहा, “बेटी, तुम हमारा कितना ख्याल रखती हो। भावेश दिल्ली जाकर बस गया है, अब हमारा हाल-चाल भी नहीं लेता।” यह सुनकर मेरा हृदय बहुत व्यथित हो उठा।
तुम्हारा दूसरा भाई सुनील निजी कंपनी में काम करने के कारण नोएडा में अत्यधिक व्यस्त रहता है। पिछले वर्ष गांव में पूजा के अवसर पर वह बहुत कम समय के लिए ही आ पाया था। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि गांव में मां-बाबूजी की देखभाल कैसे हो और कौन करे। इस विषय पर मैं लगातार सोचती रहती हूं। मैंने जीजा जी से बात की तो उन्होंने सुझाव दिया कि मैं मां-बाबूजी को पीरुमदारा ले आऊं, पर बात इतनी सरल नहीं है। गांव में हमारा पुश्तैनी मकान और दो नाली जमीन है। मैंने कई बार मां-बाबूजी से कहा कि वे मेरे साथ पीरुमदारा चलकर रहें। एक बार बहुत समझाने पर उन्हें यहां ले भी आई, लेकिन उनका मन नहीं लगा और वे वापस गांव लौट गए। अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही। दोनों ही कमजोर हो चुके हैं। उनके स्वास्थ्य, खान-पान और दवाइयों का नियमित ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
यह लिखते हुए मेरा मन बहुत भावुक हो रहा है कि तीन संतानों के माता-पिता बुढ़ापे में आज अकेले जीवन काट रहे हैं। पड़ोस की सरुली ताई बताती हैं कि वे रामनगर की ओर से आने वाली हर बस को उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं, शायद भावेश या सुनील आ रहे हों। तुम जानते हो कि मेरी शादी को बारह वर्ष हो चुके हैं और मैं अपने परिवार व बच्चों की जिम्मेदारियों में भी बंधी हूँ। कोविड काल में सासू मां के निधन के बाद मेरे ससुर जी अकेले पड़ गए हैं। उन्हें शुगर और बीपी की समस्या है। इसके बावजूद उन्होंने स्वयं कहा कि मैं धुमाकोट जाकर अपने माता-पिता के साथ कुछ दिन रह आऊं।
मैं केवल यही चाहती हूं कि अम्मा-बाबूजी का शेष जीवन सम्मान और सुकून के साथ बीते। तुम आर्थिक रूप से सक्षम हो और माता-पिता के त्याग व संघर्ष को भली-भांति समझते हो। उन्होंने कभी बेटा-बेटी में भेद नहीं किया। इसलिए गांव में लोग कहते हैं कि “राधिका पटवाल जी का तीसरा बेटा है।” इन सभी बातों पर गंभीरता से विचार करना और मेरे इस पत्र का उत्तर देना। -संतोष कुमार तिवारी, नैनीताल
