संपादकीय : एआई का कुंभ
नई दिल्ली में आयोजित एआई इंपैक्ट समिट 2026 भारत की डिजिटल कूटनीति और उभरती तकनीकी शक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन है। ग्लोबल साउथ में आकार और भागीदारी के लिहाज से पहली बार ब्रिटेन, सोल, पेरिस से भी विशाल एआई मंच सजा है, जो भारत के इस क्षेत्र में बढ़ते वैश्विक प्रभाव की कहानी कहता है। वैश्विक नेताओं, तकनीकी दिग्गजों और नीति-निर्माताओं की यहां उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बहस अब सिलिकॉन वैली या यूरोप तक सीमित नहीं रही।
यह सही है कि भारत इस क्षेत्र में अभी संक्रमणकाल में है। वह न तो पूरी तरह स्थापित शक्ति है न ही मात्र संभावनाओं का देश। उच्च-स्तरीय चिप निर्माण, मूलभूत मॉडल विकास और उन्नत अनुसंधान में भारत अभी भी अमेरिका और चीन से पीछे है। भारतीय आईटी उद्योग, स्टार्टअप इकोसिस्टम और विशाल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर आदि ने मजबूत आधार दिया है। अनुमान है कि 2030 तक भारत का एआई बाज़ार 15–20 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है, हालांकि हमें और तेज बढ़त के लिए डेटा और बुनियादी ढांचे की चुनौती से निबटना होगा।
एआई का ईंधन डेटा है, देश में व्यवस्थित डेटा-संग्रह, मानकीकरण और सुरक्षित भंडारण की कमी है। डेटा सेंटर क्षमता बढ़ने के बावजूद मांग के अनुपात में अपर्याप्त है। यदि स्थानीय भाषाओं, कृषि, स्वास्थ्य और जलवायु जैसे क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण डेटा उपलब्ध नहीं होगा, तो भारतीय एआई मॉडल सीमित रह जाएंगे, इसीलिए ‘रेगुलेटरी सैंडबॉक्स’ और डेटा गवर्नेंस फ्रेमवर्क की चर्चा अहम है। नवाचार और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना ही वास्तविक चुनौती है। विशेषज्ञों का यह दावा कि तीन वर्षों में एआई का उपयोग हजार गुना बढ़ सकता है, किंचित अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है, पर पूरी तरह अवास्तविक भी नहीं।
गौरतलब है, उपयोग में वृद्धि का अर्थ उत्पादकता वृद्धि और समावेशन तभी होगा जब कौशल विकास समानांतर चले, क्योंकि एआई का सामाजिक प्रभाव दोधारी तलवार है, जो नई स्किल सीखेंगे, उनके लिए अवसर बढ़ेंगे; जो नहीं सीखेंगे, उनके लिए रोजगार संकट गहराएगा। अतः सरकार को स्किल इंडिया कार्यक्रम में संरचनात्मक बदलाव करने होंगे। केवल पारंपरिक आईटी प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं; डेटा एनालिटिक्स, मशीन लर्निंग, साइबर सुरक्षा, एआई एथिक्स और बहुभाषी मॉडलिंग जैसे कौशल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। उद्योग–अकादमिक साझेदारी, माइक्रो-क्रेडेंशियल और ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण को बढ़ावा देना समय की मांग है।
एआई का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा में दिख सकता है। कृषि में मौसम पूर्वानुमान, मिट्टी विश्लेषण और फसल रोग पहचान; स्वास्थ्य में डायग्नोस्टिक एल्गोरिद्म और टेलीमेडिसिन; शिक्षा में वैयक्तिकृत लर्निंग प्लेटफॉर्म, ये सभी नवाचार भारत जैसे विशाल और विविध देश में क्रांतिकारी सिद्ध हो सकते हैं। इस समिट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि एआई केवल तकनीकी दौड़ नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का औजार है। भारत यदि नवाचार, नियमन और समावेशन के संतुलन को साध लेता है तो वह न केवल अपने लिए बल्कि ग्लोबल साउथ के लिए भी एक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
