संपादकीय: दूरदर्शी परियोजनाएं
साउथ ब्लॉक में होने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की आखिरी बैठक में जिन परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई, वे बुनियादी ढांचे पर केंद्रित दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का संकेत हैं। रेल, पुल, शहरी परिवहन, पूर्वोत्तर और औद्योगिक निवेश से जुड़े प्रस्तावों का सम्मिलित आकार, जो लगभग चार लाख करोड़ रुपये का है, यदि इन्हें समयबद्ध तरीके से लागू किया गया, तो इसका असर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों पर विशेष रूप से दिखाई देगा। सबसे प्रमुख निर्णयों में रेल और सेतु परियोजनाओं के लिए लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये की स्वीकृति शामिल है। पिछले एक दशक में रेलवे का पूंजीगत व्यय कई गुना बढ़ा है। 2013-14 में जहां यह लगभग 63 हजार करोड़ रुपये था, वहीं हाल के वर्षों में यह तीन लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है।
यह बताता है कि सरकार लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और माल ढुलाई क्षमता बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही है। उत्तर प्रदेश, जो पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर का केंद्र है और जहां डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के महत्वपूर्ण खंड गुजरते हैं, इन परियोजनाओं से औद्योगिक निवेश और निर्यात क्षमता में बढ़ोतरी की उम्मीद कर सकता है। 2254 करोड़ रुपये की लागत से नोएडा एक्वा लाइन मेट्रो का विस्तार ग्रेटर नोएडा और आईटी-औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी देगा। इससे रियल एस्टेट, स्टार्टअप इकोसिस्टम और सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा। उत्तर प्रदेश पहले ही एक्सप्रेसवे और मेट्रो नेटवर्क विस्तार के माध्यम से बुनियादी ढांचे में निवेश का मॉडल प्रस्तुत कर चुका है; यह कदम उस श्रृंखला को आगे बढ़ाएगा।
उत्तराखंड के संदर्भ में, रेल और पुल परियोजनाएं सामरिक तथा पर्यटन दोनों दृष्टियों से अहम हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में ऑल-वेदर कनेक्टिविटी और रेल संपर्क लंबे समय से विकास की कुंजी माने जाते रहे हैं। चारधाम परियोजना और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन जैसी पहलों के साथ यदि नई स्वीकृतियां जुड़ती हैं, तो राज्य की अर्थव्यवस्था, जो पर्यटन और रक्षा प्रतिष्ठानों पर निर्भर है, उसे स्थायित्व मिलेगा। उत्तर प्रदेश को औद्योगिक केंद्र और उत्तराखंड को सामरिक-पर्यटन हब बनाने की दिशा में यह कदम उपयोगी हो सकता है। विश्व बैंक और आरबीआई के आकलन के अनुसार बुनियादी ढांचा निवेश का गुणक प्रभाव 2 से 2.5 तक हो सकता है, अर्थात एक रुपये के निवेश से दो रुपये से अधिक की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न होती है।
ये निर्णय केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे आधारित विकास मॉडल की पुनर्पुष्टि हैं। बशर्ते घोषणाएं धरातल पर उतरें। बेशक, व्यावहारिकता का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। पिछली कैबिनेट बैठकों में घोषित कई परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी और वित्तीय पुनर्संतुलन के कारण विलंबित हुई हैं। यदि परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो वे अगले दशक की आर्थिक संरचना को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं; अन्यथा वे भी कागजी आंकड़ों तक सीमित रह जाने का जोखिम उठाएंगी, इसलिए साफ है कि इन ऐतिहासिक घोषणाओं की सफलता, इन्हें लागू कराने वाली एजेंसियों की समय सीमा प्रतिबद्धता, पारदर्शिता और निगरानी तंत्र की सुदृढ़ता ही तय करेगी।
