डिजिटल और ग्लोबल हुआ लोक गीत-संगीत
भले ही आज की युवा पीढ़ी के बड़े हिस्से को लोक गीत और संगीत उबाऊ, बेमानी और उसके प्रशंसक दिखावटी लगते हों, लेकिन यह भी सच है कि युवाओं की ही तमाम टोलियां लोक गीत-संगीत को सांस्कृतिक धरोहर मानकर आधुनिकता का नया आयाम देने में जुटी हैं। उनके इन प्रयास से पारंपरिक धुनें, डिजिटल तकनीक और फ्यूजन के साथ मिलकर नए-नए रूप में सामने आ रही हैं। गिटार, ड्रम तथा सिंथेसाइजर जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल करके युवाओं की यह कोशिश देशज गीत-संगीत को क्षेत्रीय संस्कृति से आगे बढ़ाकर वैश्विक मंच प्रदान कर रही है।
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नवाचार के मिलन की प्रक्रिया
लोक गीत-संगीत किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान में विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। वास्तव में यह उस इलाके में रहने वाले आम लोगों के रीति-रिवाजों, परंपराओं और दैनिक जीवन की कहानियों को भावनाओं और संवेदनाओं के सुरों में पिरोकर अप्रतिम झांकी प्रस्तुत करते हैं। इस तरह समय के साथ अधिकतर लोकगीत युद्ध, समुदाय, रीति-रिवाज, परंपरा, संस्कार और अनुष्ठान की पिछली घटनाओं के न सिर्फ साक्ष्य जैसे हैं, बल्कि उस क्षेत्र की जलवायु, भौगोलिक स्वरूप, लोगों के मिजाज, बोली और रहन-सहन जैसे पहलुओं को समझने का दस्तावेज भी हैं। वर्तमान में भारत का लोक संगीत समय के बदलाव के साथ लोक गीत और नवाचार के मिलन की प्रक्रिया से गुजर रहा है। इसमें पारंपरिक लोक संगीत को आधुनिकता, तकनीक और नए वाद्ययंत्रों जैसे गिटार, सिंथेसाइजर के साथ जोड़कर प्रस्तुत करने के प्रयोग देखे जा रहे हैं। इस मिश्रण ने लोक परंपराओं को युवा पीढ़ी से जोड़ने के साथ सुफियाना लोक रॉक जैसे नए रूपों को विकसित किया है।
गांवों की चौपालों तक सीमित नहीं रहे लोक गीत
देशज गीत-संगीत की एक झलक इस बार फागुन में नजर आई, जिसमें होली के मौके पर गाए जाने वाले फाग गीतों को नए अंदाज में पेश करके युवा टोलियों ने लोक संस्कृति को बड़े शहरों में जीवंत कर दिया। पारंपरिक ढोल-मंजीरे की जगह उन्होंने फास्ट बीट और फ्यूजन म्यूजिक का इस्तेमाल किया। उनकी इस कोशिश ने यह साबित कर दिखाया कि लोक गीत-संगीत सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ ही गंगा की उस धारा की तरह है, जो समय, समाज और सभ्यता के हर परिवर्तन को अपने भीतर समेटते हुए निरंतर गतिशील है। ऐसे प्रयासों से लोक गीत अब गांवों की चौखट या चौपाल तक सीमित नहीं रहे हैं। गायन मंडलियां और आधुनिक बैंड नई शैलियों का निर्माण करके इन्हें डिजिटल और ग्लोबल मंचों तक पहुंचाने में जुटी हैं, जो नई पीढ़ी को खासा पसंद आ रहा है।
राजस्थानी लोक संगीत में बढ़ी फ्यूजन और बॉलीवुड की धमक
लोक गीत और नवाचार के माध्यम से परंपरा की जड़ों को आधुनिकता के साथ जोड़कर किस तरह नया स्वरूप प्रदान किया जा रहा है, इसकी एक झलक राजस्थान के संगीत में देखी जा सकती है, जो अपनी विशिष्ट विशेषताओं के कारण निरंतर ऊंचाइयों की ओर अग्रसर तो है, लेकिन उसने आधुनिकता के लिए दरवाजे भी खोल रखे हैं। संगीतकारों के डिजिटल प्लेटफॉर्म, पारंपरिक संगीत के फ्यूजन और बॉलीवुड में हुए प्रयोग इसी बात की पुष्टि करते नजर आते हैं। वहां तमाम लोक कलाकारों ने अपने पारंपरिक संगीत को फ्यूजन और बॉलीवुड की शैली में ढालकर नए दर्शकों तक पहुंचाया है। इससे न केवल संगीत की लोकप्रियता बढ़ी है, बल्कि युवा वर्ग में इसे लेकर रुचि भी जगी है। इस तरह वैश्विक संस्कृति से संपर्क, उन्नत तकनीक और लोगों की पसंद में आ रहे बदलाव से राजस्थान का संगीत धीरे-धीरे परिवर्तन की सीढ़ियां चढ़ रहा है।
पंजाब में ‘फोक टर्बेनेटर्स’ मेलों में जमा रहे नया रंग
पंजाब की लोक गायकी को भी वहां के युवाओं ने नए रंग भरकर फिर से जिंदा कर दिया है। पारंपरिक परिधानों में युवाओं की टोलियां आज वहां मेलों और पर्वों के मौके पर लोक गीतों को नए स्वर देती नजर आती हैं, जिसे सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। ऐसे युवाओं के म्यूजिक ग्रुप ‘फोक टर्बेनेटर्स’ के नाम से जाने जाते हैं। लाइव शो करने के साथ मेलों और प्रदर्शनियों में गाना-बजाना अब लोक संस्कृति की पहचान बन चुका है।
पारंपरिक लोक धुनों की नई विधा रॉक या इलेक्ट्रो
पारंपरिक लोक धुनों को आधुनिक वाद्ययंत्रों और रॉक, पॉप या जैज जैसी पश्चिमी शैलियों के साथ मिलाकर ‘फोल्क-रॉक’ या ‘इलेक्ट्रो-फोल्क’ जैसी नई विधाएं तैयार की जा रही हैं। उदाहरण के लिए सूफी फोल्क रॉक भारत और पाकिस्तान में काफी लोकप्रिय हुआ है। बॉलीवुड ने भी तमाम पारंपरिक लोक गीतों को आधुनिक संगीत व्यवस्था के साथ पेश करके लोकप्रियता का नए शिखर पर पहुंचाया है। ‘घूमर’ या ‘नगाड़ा के साथ ढोल’ जैसे प्रयोग इसी का उदाहरण हैं। यही नहीं, तकनीक के माध्यम से लोक गीतों को रिकॉर्ड कर आर्काइव किया जा रहा है और सोशल मीडिया एवं स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के जरिए तेजी से युवाओं तक पहुंचाया जा रहा है।
विरासत की लहरियों को नए आयाम दे रहे बैंड
पद्म अनूप रंजन पांडे का लोकप्रिय बस्तर बैंड आदिवासी कलाकारों का ऐसा समूह है, जिसने पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य को विदेशों तक पहुंचाया है। अपनी अनूठी स्वर लहरियों के साथ यह बैंड अलग छाप छोड़ता है। हालांकि बस्तर बैंड का कहना है कि वह अपनी मिट्टी से जुड़ा है और उसने लोक कलाओं में न तो कोई संशोधन किया है और न ही आधुनिकता का तड़का लगाया है। इसी तरह सादिक, असिन और जाकिर का साज बैंड रजस्थानी गीत-संगीत की परंपरा को नए आयाम देने के साथ अपनी विरासत को संरक्षित कर रहा है। ऐसे ही लुप्त होती पारंपरिक संगीत संस्कृति को संरक्षित करने के लिए ओडिशा ने पहला लोक संगीत बैंड ‘आदि धुन’ बनाया है।- मनोज त्रिपाठी
