केवल देखने तक सीमित नहीं कला का अनुभव
एक प्रचलित कहावत है “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है”। स्पष्ट है यह कहावत दृष्टिबाधितों द्वारा रंगों की समझ और अनुभूति पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। दूसरी तरफ विज्ञान उन चुनौतियों को भी स्वीकारता चला आ रहा है, जिसे सामान्य व्यक्ति लगभग असंभव मान लेते हैं। ऐसे में खबर है कि एम्स्टर्डम स्थित वान गॉग म्यूजियम ने कला को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है।
इसके तहत यह संग्रहालय अब दृष्टिहीन और कम दृष्टि वाले दर्शक को भी महान डच चित्रकार विन्सेंट वान गॉग की कलाकृतियों की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। आमतौर पर चित्रकला को देखने की कला माना जाता है, इसलिए दृष्टिबाधित लोगों के लिए इसे समझना या अनुभूत करना कठिन माना जाता है। ऐसे में एम्स्टर्डम स्थित इस संग्रहालय ने कई अभिनव उपायों के माध्यम से इस चुनौती को अवसर में बदल दिया है।-सुमन कुमार सिंह
संग्रहालय ने विशेष रूप से तैयार की गई स्पर्शनीय (टैक्टाइल) प्रतिकृतियां विकसित की हैं, जिनकी सहायता से दृष्टिहीन आगंतुक चित्रों की संरचना और आकृतियों को हाथों से महसूस कर सकते हैं। इन प्रतिकृतियों में चित्र की मुख्य रेखाओं, बनावट और रूपों को उभरे हुए रूप में तैयार किया गया है, जिससे दर्शक स्पर्श के माध्यम से यह समझ सकें कि चित्र में कौन-कौन से तत्व मौजूद हैं और उनका आपसी संबंध क्या है।
इसके साथ ही संग्रहालय में ऑडियो गाइड और विशेष वर्णनात्मक व्याख्याएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। इन विवरणों में चित्रों के रंगों, प्रकाश, भावनाओं और संरचना का विस्तार से वर्णन किया जाता है, ताकि दृष्टिबाधित दर्शक भी कल्पना के माध्यम से चित्र की दुनिया में प्रवेश कर सकें। उदाहरण के लिए, वान गॉग की प्रसिद्ध कृतियों में दिखाई देने वाले तीव्र रंगों, गतिशील ब्रश स्ट्रोक और प्रकृति के जीवंत दृश्यों को शब्दों के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि श्रोता उनके भावात्मक प्रभाव को महसूस कर सके।
इसके अतिरिक्त संग्रहालय समय-समय पर विशेष समावेशी कार्यशालाएं और मार्गदर्शित भ्रमण भी आयोजित करता है, जिनमें प्रशिक्षित विशेषज्ञ आगंतुकों को कला के अनुभव से जोड़ते हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य यह दिखाना है कि कला केवल आंखों से देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे स्पर्श, ध्वनि और कल्पना के माध्यम से भी महसूस किया जा सकता है।
इस पहल के पीछे एक व्यापक विचार यह है कि संग्रहालय केवल वस्तुओं को प्रदर्शित करने का स्थान न होकर समाज के सभी वर्गों के लिए खुला सांस्कृतिक मंच बने। वान गॉग म्यूज़ियम की यह पहल दुनियाभर के संग्रहालयों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है। यह दिखाती है कि यदि रचनात्मक सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो कला का अनुभव हर व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है- चाहे वह देख सकता हो या नहीं।
इस प्रकार यह संग्रहालय न केवल महान कलाकार वान गॉग की कला को संरक्षित कर रहा है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है कि कला की दुनिया वास्तव में सबके लिए है यानी उनके लिए भी जो देखने में सक्षम नहीं हैं। वैसे दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए चित्रकला को सुलभ बनाने का प्रयास केवल हाल के वर्षों की पहल नहीं है। दुनिया के कई संग्रहालयों और कला संस्थानों ने लंबे समय से ऐसे प्रयोग किए हैं, जिनके माध्यम से दृष्टिबाधित दर्शक भी कला का अनुभव कर सकें। आज वान गॉग म्यूजियम द्वारा किए जा रहे प्रयास इसी व्यापक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
दरअसल 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोप और अमेरिका के कई संग्रहालयों ने ‘टैक्टाइल आर्ट’ यानी स्पर्श आधारित कला अनुभव की अवधारणा पर काम करना शुरू किया। लंदन के टेट गैलरी में 1980 के दशक में ऐसी प्रदर्शनियां आयोजित की गईं, जिनमें दर्शकों को मूर्तियों को छूकर समझने की अनुमति दी गई। इन प्रदर्शनों का उद्देश्य यह बताना था कि कला का अनुभव केवल देखने तक सीमित नहीं है, उसे स्पर्श और कल्पना के माध्यम से भी समझा जा सकता है।
इसी प्रकार भारत में भी संग्रहालयों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में ‘अनुभव: ए टैक्टाइल एक्सपीरियंस’ नामक विशेष गैलरी बनाई गई है, जहां प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों की स्पर्शनीय प्रतिकृतियां रखी गई हैं। इन प्रतिकृतियों के साथ ब्रेल लिपि में जानकारी और ऑडियो विवरण भी उपलब्ध कराया गया है, जिससे दृष्टिबाधित दर्शक कला को बेहतर ढंग से समझ सकें।
आजकल नई तकनीकों के माध्यम से चित्रों और मूर्तियों को 3-डी टैक्टाइल मॉडल में बदलने के प्रयोग भी किए जा रहे हैं। इन मॉडलों में चित्र की रेखाओं और आकृतियों को उभरे हुए रूप में बनाया जाता है, ताकि दर्शक उन्हें हाथों के स्पर्श से महसूस कर सकें। वास्तव में इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य यह है कि संग्रहालय और कला संस्थान समाज के हर वर्ग के लिए उपयोगी साबित हों। जाहिर है कि इस प्रकार की पहल का मुख्य उद्देश्य यह साबित करना है कि कला केवल आंखों से देखने की वस्तु नहीं, बल्कि संवेदनाओं और अनुभवों की एक व्यापक दुनिया है, जिसे हर व्यक्ति अपने तरीके से महसूस कर सकता है।
