कैंपस का पहला दिन: अभी भी याद है पहली बार मेस में खाना

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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नैनीताल की शांत वादियों में मेरा बचपन बीता। पहाड़ों की उस निश्चल दुनिया से निकलकर जब मैं सन् 1977 में लाला लाजपत राय स्मारक चिकित्सा महाविद्यालय, मेरठ पहुंचा, तो मन में एक अजीब सी कशमकश और अनजाना भय था। उन दिनों मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग के किस्से आम थे, इसलिए सीनियरों के व्यवहार को लेकर मन में कई नकारात्मक भ्रम पाल रखे थे, लेकिन कॉलेज की देहरी पर कदम रखते ही पहले ही दिन वे सारे डर काफूर हो गए। कैंपस का वातावरण उम्मीद से बिल्कुल उलट था। मुझे आज भी अचंभित कर देता है कि उन सीनियरों ने, जिन्हें लेकर मैं डरा हुआ था, पहले ही दिन से न केवल मेरा, बल्कि सभी नए छात्रों का हाथ थाम लिया।

वहां रैगिंग नहीं, बल्कि एक बड़े भाई जैसा अपनत्व और सहयोग था। जीवन का वह पहला अनुभव जब मैं घर की सुख-सुविधा छोड़कर मेस में खाना खाने पहुंचा, तो भावुक हो गया। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि परिवार से दूर, बिल्कुल अजनबियों के साथ एक ही टेबल पर बैठकर भोजन करूंगा, लेकिन वह मेस की टेबल केवल खाना खाने की जगह नहीं थी, बल्कि रिश्तों की पाठशाला थी। हंसी-मजाक के उस दौर के बीच खाने का वह स्वाद आज भी मेरी जुबान पर ताजा है। वहीं से सहपाठियों के साथ परिचय का सिलसिला शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे अटूट दोस्ती में बदल गया। 

हॉस्टल की पहली रात और वॉर्डन द्वारा समझाए गए कड़े नियमों ने एहसास कराया कि अब आजाद पंछी को अनुशासन के पिंजरे में खुद को ढालना होगा। वह अनुशासन ही था, जिसने हमें सिखाया कि समय की कीमत क्या होती है और एक डॉक्टर के जीवन में नैतिकता का क्या महत्व है। पहाड़ की मासूमियत और मेरठ की इस अनुशासित मेधा ने मिलकर मेरे भीतर एक नए इंसान को जन्म दिया। वह सफेद कोट पहनना केवल एक करियर की शुरुआत नहीं थी, बल्कि सेवा और समर्पण के उस सफर का आगाज था, जिसकी नींव उसी साल मेरठ की मिट्टी में रखी गई थी। आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो वे यादें जीवन की सबसे अनमोल थाती लगती हैं।-डॉ. अरुण जोशी मेडिकल सुपरिडेंट, राजकीय अस्पताल, हल्द्वानी

 

 

 

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