इलियास ने लिखी इंसानियत की इबारत : नमाज छोड़ तड़प रहे आयुष को पहुंचाया अस्पताल
हरदोई, अमृत विचार। घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये, शायर निदा फाजली का यह शेर हरदोई के इलियास गाजी पर एकदम सटीक बैठता है। उन्होंने अपने काम के जरिये यह साबित कर दिया कि जरूरतमंद की मदद करना इबादत से कम नहीं है।
दरअसल, शुक्रवार को अलविदा की नमाज़ पढ़ने जा रहे इलियास गाजी की नजर जैसे ही सड़क किनारे तड़प रहे मासूम आयुष पर पड़ी,मस्जिद का रास्ता छोड़ कर वह उस मासूम की तरफ दौड़ पड़ा और आयुष को उठा कर सीएचसी पहुंचा कर उसकी ज़िंदगी बचायी। इलियास का कहना है कि इंसानियत से बढ़ कर कोई दूसरी इबादत नहीं,अगर वह उस लम्हे को नज़रदाज़ कर देता तो शायद खुदा उसकी इबादत कबूल न करता।
हुआ कुछ यूं कि पिहानी कोतवाली के पतरास निवासी आकाश पुत्र भइया लाल शुक्रवार को बाइक से अपनी बहन सुदामा और भांजे आयुष को आंझी-शाहाबाद रेलवे स्टेशन छोड़ने जा रहे थे। नेवादा के पास पहुंचते ही तेज़ रफ्तार बोलेरो ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी,जिससे तीनो़ बाइक सवार सड़क पर दूर जा गिरे,उसी बीच निज़ामपुर निवासी इलियास गाजी अपने साथियों यूनुस,इस्लाम, एहसान व असलम के साथ अलविदा की नमाज़ पढ़ने जा रहा था, उन्होंने आयुष को तड़पते देखा और दौड़ कर उसे उठा लिया,उसके बाद अपने खर्चे से उन तीनों को सीएचसी पिहानी पहुंचाया,जहां शुरु हुये इलाज से उन सभी का जीवन बच सका है।
इलियास गाजी का कहना है कि इबादत का असली मकसद ही जरूरतमंद की मदद करना, अगर किसी को तड़पता छोड़कर इबादत की जाए,तो शायद खुदा उस इबादत को कबूल नहीं करेगा।
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