हाईकोर्ट ने बृजभूषण-राजा भैया समेत 50 बाहुबलियों की मांगी क्राइम कुंडली.. हथियारों-सुरक्षा की जांच के भी आदेश

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Published By Ankit Yadav
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अमृत विचार, लखनऊ | उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों और आपराधिक मामलों में घिरे लोगों को गन लाइसेंस और सरकारी सुरक्षा दिए जाने के मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने 26 मई तक जोनवार, जिलावार और थानावार ऐसे लोगों की सूची पेश करने का आदेश दिया है, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं लेकिन फिर भी उन्हें शस्त्र लाइसेंस और सुरक्षा मुहैया कराई गई है। कोर्ट ने जिन नामों का विशेष रूप से उल्लेख किया उनमें बृजभूषण शरण सिंह, रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, धनंजय सिंह, सुशील सिंह और विनीत सिंह जैसे प्रभावशाली नेताओं के नाम शामिल हैं।

जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने बृजभूषण शरण सिंह, राजा भैया, धनंजय सिंह, सुशील सिंह, विनीत सिंह समेत 50 से ज्यादा प्रभावशाली लोगों की अपराध कुंडली तलब की है। कोर्ट ने कहा है कि जोनवार, जिला और थानावार पूरी जानकारी हलफनामे के साथ पेश की जाए।

कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को दी सख्त चेतावनी

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि कई जिलों के पुलिस अधिकारियों ने अपने हलफनामों में प्रभावशाली और राजनीतिक लोगों की आपराधिक जानकारी छिपाई है। यह गंभीर मामला है। अब कोर्ट ने आदेश दिया है कि संबंधित जिले के एसपी या कमिश्नरेट के पुलिस कमिश्नर अंडरटेकिंग देकर बताएंगे कि कोई जानकारी छिपाई नहीं गई है। अगर बाद में तथ्य छिपाने की बात सामने आती है तो संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।

संत कबीरनगर के जयशंकर की याचिका पर सुनवाई

यह मामला संत कबीरनगर निवासी जयशंकर उर्फ बैरिस्टर की याचिका के बाद सामने आया। याचिका में आरोप लगाया गया कि गन लाइसेंस जारी करने में नियमों की अनदेखी की जा रही है और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को भी आसानी से लाइसेंस मिल रहे हैं।

सरकार के हलफनामे में क्या सामने आया?

18 मई को सुनवाई के दौरान गृह विभाग की ओर से पेश हलफनामे में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। सरकार ने कोर्ट को बताया कि:

  • यूपी में कुल 10,08,953 शस्त्र लाइसेंस जारी हैं।
  • 6,062 ऐसे लोगों को लाइसेंस दिए गए हैं जिन पर दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
  • 20,960 परिवारों के पास एक से अधिक शस्त्र लाइसेंस मौजूद हैं।
  • शस्त्र लाइसेंस से जुड़े 23,407 आवेदन अभी लंबित हैं।
  • डीएम और पुलिस अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ 1,738 अपीलें कमिश्नरों के पास लंबित हैं।

इन आंकड़ों को देखकर कोर्ट ने चिंता जताई और कहा कि यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हथियारों का खुला प्रदर्शन समाज में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। आत्मरक्षा के नाम पर हथियार रखना अलग बात है, लेकिन जब उनका इस्तेमाल दबदबा दिखाने और लोगों को डराने के लिए होने लगे, तो यह कानून व्यवस्था और सामाजिक शांति दोनों के लिए खतरा बन जाता है।कोर्ट ने साफ कहा कि बंदूक और धमकी की संस्कृति किसी भी शांतिपूर्ण और कानून आधारित समाज के लिए ठीक नहीं मानी जा सकती।

शस्त्र लाइसेंस को लेकर नियम क्या कहते हैं?

भारत में शस्त्र लाइसेंस जारी करने के लिए आर्म्स एक्ट के तहत कई नियम बनाए गए हैं। किसी भी व्यक्ति को लाइसेंस देने से पहले पुलिस सत्यापन किया जाता है। यदि व्यक्ति का आपराधिक इतिहास हो या कानून व्यवस्था के लिए खतरा माना जाए तो लाइसेंस रोका जा सकता है।

हालांकि कई बार आरोप लगते रहे हैं कि राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक दबाव के चलते नियमों में ढील दी जाती है। यही वजह है कि कोर्ट ने अब पूरी प्रक्रिया की जांच के आदेश दिए हैं।

यूपी के 19 चर्चित बाहुबली

उत्तर प्रदेश लंबे समय से बाहुबलियों और राजनीतिक प्रभाव वाले नेताओं की राजनीति के लिए चर्चा में रहा है। अलग-अलग जोन में कई ऐसे नाम रहे हैं जिन पर गंभीर मुकदमे दर्ज होने के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव बना रहा। हाईकोर्ट ने 19 बाहुबली नेताओं और हिस्ट्रीशीटरों की सूची जारी की है।

अवध और मध्य यूपी

अवध क्षेत्र में भी कई ऐसे प्रभावशाली लोग रहे जिनके पास शस्त्र लाइसेंस और सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कोर्ट ने जिलावार पूरी सूची तलब की है।

बृजभूषण शरण सिंह

Brijbhushan Sharan Singh

कैसरगंज से पूर्व सांसद रहे बृजभूषण शरण सिंह का नाम कई बार विवादों में आया। उन पर पहले भी विभिन्न मुकदमे दर्ज होने की बात सामने आती रही है। हालांकि वे खुद को राजनीतिक साजिश का शिकार बताते रहे हैं। हाल के वर्षों में महिला पहलवानों के आरोपों के बाद उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था।

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया

Raja Bhaiya

कुंडा से विधायक राजा भैया प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा नाम हैं। उनके खिलाफ समय-समय पर कई मुकदमे दर्ज हुए, हालांकि वे अधिकांश आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते रहे हैं। राजा भैया की क्षेत्र में मजबूत पकड़ मानी जाती है।

पूर्वांचल

पूर्वांचल को लंबे समय से बाहुबली राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। यहां कई ऐसे नेता रहे जिनका राजनीति और अपराध दोनों से नाम जुड़ा रहा।

धनंजय सिंह

Dhananjay Singh

जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह पूर्वांचल की राजनीति का बड़ा नाम रहे हैं। उन पर रंगदारी, धमकी और अन्य गंभीर मामलों में मुकदमे दर्ज रहे। हालांकि धनंजय सिंह कई मामलों में खुद को निर्दोष बताते रहे हैं और राजनीतिक बदले की कार्रवाई का आरोप लगाते रहे हैं।

सुशील सिंह

Bahubali Sunil Singh

सुशील सिंह का नाम भी कोर्ट में चर्चा के दौरान सामने आया। उनके खिलाफ कई मामलों की जांच और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

विनीत सिंह

.Vineet Singh

विनीत सिंह का नाम भी प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल बताया गया है। पुलिस रिकॉर्ड और पुराने मामलों को लेकर कोर्ट ने पूरी जानकारी मांगी है।

विजय मिश्रा

Vijay Mishra

भदोही के पूर्व विधायक विजय मिश्रा का नाम भी प्रदेश के चर्चित बाहुबलियों में शामिल रहा है। उन पर कई गंभीर मामले दर्ज रहे हैं। वे कई बार जेल भी जा चुके हैं।

सुजीत सिंह 'बेलवा'

Sujeet Singh Belwa (1)

सुजीत सिंह 'बेलवा' वाराणसी और पूर्वांचल के एक चर्चित हिस्ट्रीशीटर और बाहुबली हैं। वह वाराणसी के फूलपुर थाना क्षेत्र के बेलवा गांव के निवासी हैं और स्थानीय राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं।

सुधीर सिंह उर्फ पप्पू भौकाली

Pappu Bhaukali

सुधीर सिंह उर्फ पप्पू भौकाली वाराणसी और पूर्वांचल के एक चर्चित बाहुबली और राजनीतिज्ञ हैं। वह वाराणसी के चिरईगांव ब्लॉक के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं।

उपेंद्र सिंह गुड्डू

Upendra Singh Guddu

उपेंद्र सिंह 'गुड्डू' उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले (वाराणसी संभाग) के एक कद्दावर नेता और बाहुबली छवि वाले व्यक्ति हैं। 
वह मुख्य रूप से सकलडीहा विधानसभा क्षेत्र और चहनियां ब्लॉक में सक्रिय हैं। हाल के वर्षों में प्रशासन द्वारा उनके खिलाफ की गई जिलाबदर (Expulsion) की कार्रवाई के कारण वह काफी चर्चा में रहे हैं। 
 
इसके अलावा लिस्ट में अजय सिंह उर्फ अजय मरहद, इंद्रदेव सिंह, सुनील यादव, फरार अजीम, बादशाह सिंह, संग्राम सिंह, सुल्लू सिंह, चुलबुल सिंह, सनी सिंह, चुन्नू सिंह और उदय भान सिंह का नाम शामिल है।

 

इनकी भी जोनवार मांगी गई जानकारी

नोएडा कमिश्नरेट

अमित कसाना, अनिल भाटी, रणदीप भाटी, मनोज आमे, अनिल दुजाना, सुंदर सिंह भाटी, शिवराज सिंह भाटी

मेरठ जोन

उधम सिंह, योगेश भदौड़ा, मदन सिंह बद्दो, हाजी याकूब कुरैशी, शारिक, सुनील राठी, धर्मेंद्र, यशपाल तोमर, अमरपाल कालू, अनुज बरखा, विक्रांत विक्की, हाजी इकबाल, विनोद शर्मा, सुनील उर्फ मूंछ, विनय त्यागी उर्फ टिंकू, संजीव माहेश्वरी

आगरा जोन

अनिल चौधरी, ऋषि कुमार शर्मा

बरेली जोन

एजाज

लखनऊ जोन और कमिश्नरेट

खान मुबारक, अजय प्रताप सिंह उर्फ अजय सिपाही, संजय सिंह सिंघाला, अतुल वर्मा, मोहम्मद साहिब, सुधाकर सिंह, गुड्डू सिंह, अनूप सिंह, लल्लू यादव, बच्चू यादव, जुगनू वालिया उर्फ हरविंदर।

प्रयागराज जोन और कमिश्नरेट

डब्बू सिंह उर्फ प्रदीप सिंह, बच्चा पासी उर्फ निहाल सिंह, दिलीप मिश्रा, जावेद, राजेश यादव, गणेश यादव, कमरूल हसन, जाविर हुसैन।

वाराणसी जोन और कमिश्नरेट

त्रिभुवन सिंह उर्फ पवन सिंह, विजय मिश्रा, कुंटू सिंह उर्फ ध्रुव सिंह, अखंड प्रताप सिंह, रमेश सिंह काका, अभिषेक सिंह हनी उर्फ जहर, बृजेश कुमार सिंह, सुभाष सिंह ठाकुर, अब्बास अंसारी, पिंटू सिंह।

गोरखपुर जोन 

राजन तिवारी, संजीव द्विवेदी उर्फ रामू द्विवेदी, राकेश यादव, सुधीर सिंह, विनोद उपाध्याय, रिजवान जहीर, देवेंद्र सिंह।

कानपुर कमिश्नरेट

अनुपम दुबे, सऊद अख्तर

मुख्तार अंसारी नेटवर्क

मुख्तार अंसारी का निधन हो चुका है, लेकिन पूर्वांचल में उनका राजनीतिक और आपराधिक नेटवर्क लंबे समय तक चर्चा में रहा। गाजीपुर, मऊ और आसपास के जिलों में उनके प्रभाव को लेकर कई बार राजनीतिक बहस होती रही।

अतीक अहमद गैंग

अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ की हत्या के बाद भी प्रयागराज में उनका नेटवर्क चर्चा का विषय बना हुआ है। अतीक पर हत्या, रंगदारी, जमीन कब्जा और गैंगस्टर जैसे कई मुकदमे दर्ज थे। योगी सरकार ने उनके नेटवर्क के खिलाफ बड़े स्तर पर कार्रवाई की थी।

 

योगी सरकार की कार्रवाई और माफिया पर अभियान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद प्रदेश में माफिया और बाहुबलियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाया गया। सरकार ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में हजारों करोड़ की अवैध संपत्ति जब्त की गई और कई गैंगस्टरों पर सख्त कार्रवाई हुई।

योगी आदित्यनाथ कई मंचों से कह चुके हैं कि प्रदेश में अपराध और माफिया के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कई बार कहा कि कानून व्यवस्था सरकार की प्राथमिकता है और अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रहेगी।

  • माफिया की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई हुई।
  • गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई तेज की गई।
  • अपराधियों की आर्थिक कमर तोड़ने पर फोकस किया गया।
  • पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

हालांकि विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि कार्रवाई चुनिंदा लोगों के खिलाफ होती है जबकि कई प्रभावशाली लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है।

बीजेपी की प्रतिक्रिया

बीजेपी नेताओं का कहना है कि योगी सरकार में कानून व्यवस्था पहले से बेहतर हुई है। पार्टी नेताओं के अनुसार हाईकोर्ट द्वारा मांगी गई रिपोर्ट सरकार की पारदर्शिता को मजबूत करेगी और यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी पाई जाती है तो कार्रवाई की जाएगी। बीजेपी प्रवक्ताओं ने कई बार कहा है कि योगी सरकार ने माफिया के खिलाफ सबसे सख्त अभियान चलाया है और किसी को भी कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।


विपक्ष क्या कह रहा?

समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि कई प्रभावशाली लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है और उन्हीं लोगों को लाइसेंस और सुरक्षा भी आसानी से मिल जाती है। कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सख्त है तो सभी बाहुबलियों और हिस्ट्रीशीटरों की सूची सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही जिन लोगों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे हैं, उनके लाइसेंस की समीक्षा होनी चाहिए।

आने वाले दिनों में क्या हो सकता है?

26 मई को जब सरकार और पुलिस प्रशासन अपनी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करेंगे तब कई बड़े नामों और मामलों का खुलासा हो सकता है। कोर्ट यह भी देखेगा कि किन परिस्थितियों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को गन लाइसेंस जारी किए गए।

यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो:

  • कई लाइसेंस रद्द हो सकते हैं।
  • अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
  • सुरक्षा समीक्षा की जा सकती है।
  • लाइसेंस प्रक्रिया में नए नियम लागू किए जा सकते हैं।

प्रदेश की राजनीति पर असर

यह मामला सिर्फ कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं है बल्कि इसका राजनीतिक असर भी दिखाई दे सकता है। प्रदेश में लंबे समय से बाहुबली राजनीति बड़ा मुद्दा रही है। ऐसे में हाईकोर्ट की सख्ती आने वाले समय में राजनीतिक दलों की रणनीति को भी प्रभावित कर सकती है।विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि कोर्ट की निगरानी में व्यापक जांच होती है तो कई जिलों में पुराने मामलों की फाइलें दोबारा खुल सकती हैं। इससे राजनीति और प्रशासन दोनों में बड़ा असर देखने को मिल सकता है।

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