हाईकोर्ट : ट्रायल में प्रस्तुत ठोस साक्ष्य ही तय करेंगे अतिरिक्त आरोपी की भूमिका

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Published By Virendra Pandey
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प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब करने का निर्णय केवल मुकदमे के दौरान दर्ज साक्ष्यों के आधार पर ही लिया जा सकता है। आरोपपत्र या केस डायरी में उपलब्ध सामग्री को इस प्रयोजन के लिए साक्ष्य नहीं माना जा सकता। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की एकलपीठ ने दहेज हत्या के एक मामले में मृतिका के सास, ससुर और देवर को अतिरिक्त आरोपी बनाए जाने की मांग को खारिज करते हुए की।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 319 के तहत दी गई शक्ति असाधारण प्रकृति की है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी तथा संयम के साथ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि केवल प्रथम दृष्टया मामला होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ट्रायल के दौरान सामने आए साक्ष्यों से यह प्रतीत होना चाहिए कि प्रथम दृष्टया से अधिक ठोस मामला बनता है। मामले के अनुसार  अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट, कौशांबी ने 8 नवंबर 2024 को पति के परिजनों को तलब करने से इनकार कर दिया था। मृतिका राधिका के पिता मान सिंह ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।

अभियोजन के अनुसार राधिका का विवाह लगभग पांच वर्ष पूर्व मनोज यादव से हुआ था। आरोप था कि विवाह के बाद पति और उसके परिजनों ने अतिरिक्त दहेज के रूप में भैंस और सोने की अंगूठी की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया। 7 जनवरी 2020 को राधिका का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिला। पिता ने आरोप लगाया कि उसकी बेटी की हत्या कर शव को फांसी पर लटका दिया गया। इस संबंध में आईपीसी की धारा 498-ए, 304बी तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि पुलिस जांच में पति के अलावा अन्य परिजनों की संलिप्तता नहीं पाई गई और केवल पति के खिलाफ ही आरोपपत्र दाखिल किया गया। ट्रायल के दौरान अभियोजन ने गवाहों के बयानों के आधार पर अन्य परिजनों की भूमिका होने का दावा किया, जबकि बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ससुराल पक्ष अलग रह रहा था और घटना में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।

इस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 319 में प्रयुक्त ‘साक्ष्य’ का आशय केवल ट्रायल के दौरान रिकॉर्ड किए गए साक्ष्यों से है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जांच अधिकारी की गवाही के अनुसार दहेज की मांग पति द्वारा की गई थी और वह मृतिका से अलग रह रहा था। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

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