संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले- भारत जब तक धर्म के मार्ग पर चलता रहेगा, तब तक 'विश्वगुरु' बना रहेगा

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Published By Deepak Mishra
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मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि जब तक धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, देश 'विश्वगुरु' बना रहेगा। भागवत ने यहां एक कार्यक्रम में कहा कि ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान दुनिया के दूसरे हिस्सों में नहीं पाया जाता। उन्होंने कहा कि धर्म ही पूरे ब्रह्मांड को चलाता है और सब कुछ उसी सिद्धांत पर चलता है। 

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत को अपने पूर्वजों से एक समृद्ध आध्यात्मिक धरोहर विरासत में मिली है और साधु-संतों से मार्गदर्शन मिलता रहा है। भागवत ने कहा कि धर्म केवल धार्मिकता तक सीमित नहीं है और प्रकृति में हर किसी का अपना नैतिक कर्तव्य व अनुशासन होता है। उन्होंने कहा कि जब तक ऐसा धर्म भारत का मार्गदर्शन करता रहेगा, तब तक भारत 'विश्वगुरु' बना रहेगा।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया के पास इस तरह का ज्ञान नहीं है, क्योंकि उसमें आध्यात्मिकता की कमी है। उन्होंने कहा, ''यह हमारे पूर्वजों की विरासत है, जो हमें मिली है।'' भागवत ने कहा, ''चाहे वह नरेन्द्र भाई हों, मैं हूं, आप हों या कोई और, हम सभी को एक ही शक्ति चला रही है। यदि वाहन उस शक्ति से चले, तो कभी कोई दुर्घटना नहीं होगी। वह चालक धर्म है।'' 

भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि जब सृष्टि का निर्माण हुआ, तो इसके क्रियाकलापों को संचालित करने वाले नियम ही धर्म बन गए। भागवत ने कहा कि धर्म केवल धार्मिकता तक सीमित नहीं है और प्रकृति में हर किसी का अपना नैतिक कर्तव्य व अनुशासन होता है। भागवत ने कहा, "पानी का धर्म है बहना, आग का धर्म है जलाना। पुत्र का कर्तव्य है, शासक का कर्तव्य है और आचार-व्यवहार के नियम होते हैं। हमारे पूर्वजों ने इन नियमों को आध्यात्मिक शोध और महान प्रयासों के माध्यम से समझा।" 

उन्होंने उस अहंकार से बचने का आग्रह किया, जो किए जा रहे पवित्र कार्य को बिगाड़ सकता है। भागवत ने कहा, ''हमें अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है।'' भागवत ने एक कुम्हार के गधे की एक कहानी भी साझा की, जो एक मूर्ति ढोते समय यह गलती से मान बैठा कि गांववाले उसे नमन करते हैं। उन्होंने कहा कि गधा सम्मान की उम्मीद करने लगा और जब उसने सम्मान मांगा, तो उसे पीटा गया। भागवत ने कहा कि भारत ने समय-समय पर दुनिया को धर्म दिया है। 

उन्होंने कहा, '' हमारे पास किताबें और वक्ता हैं, लेकिन धर्म असल में जीवन में अमल में लाया जाता है और इसका अनुसरण किया जाता है।'' उन्होंने कहा, "धर्म सत्य पर आधारित है, और जो लोग लगातार उस सत्य के साथ जीते हैं, वे ऋषि होते हैं। यह हमारा कर्तव्य है कि हम ऋषियों को सुरक्षा प्रदान करें और उनकी गरिमा बनाए रखें। यहां तक कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि ऋषि को न कहना उनके लिए एक अजीब पल होता है।" 

आध्यात्मिक और भौतिक भूमिकाओं के बीच संबंध को स्पष्ट करते हुए, भागवत ने कहा कि यह एक बहुत पवित्र कार्य है, और ''हम केवल उन आध्यात्मिक व्यक्तियों की रक्षा करते हैं, जो सच्चे नेता होते हैं''। उन्होंने कहा, "हम भी रक्षक हैं; हम नेतृत्व नहीं करते। आध्यात्मिक लोग ही सच्चे नेता होते हैं। उन्हें ऐसा करने में सक्षम होना चाहिए, और हम केवल उनकी रक्षा करते हैं। हम ही दरवाजे की रक्षा करने वाले हैं।" 

उन्होंने कहा कि राज्य धर्मनिरपेक्ष हो सकता है, लेकिन कोई भी मानव या कोई भी सृष्टि धर्म रहित नहीं हो सकती। भागवत ने सेवा में लगे लोगों से अहंकार त्यागने और सामूहिक भावना को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा, "यहां इतने सारे लोग हैं, और हम सभी अच्छा काम कर रहे हैं। 'मैं' की मानसिकता में फंसने के बजाय, हमें 'हम' की मानसिकता अपनानी चाहिए।" भागवत ने चेतावनी दी कि कुछ लोग ऐसे कार्यों को खराब करने की कोशिश करेंगे, लेकिन यदि आप अच्छा काम कर रहे हैं, तो परिणाम की अपेक्षा न करें, बल्कि अच्छे की नीयत से काम करते रहें।

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