Moradabad: सोना मोहपात्रा ने सुरों से बांधा समां, मुरादाबाद में गूंजा अंबरसरिया रंग
मुरादाबाद, अमृत विचार। गांधी मैदान में आयोजित उदीषा चौपाला साहित्योत्सव के स्टार नाइट में अंबरसरिया बॉलीवुड गायिका सोना मोहपात्रा ने अपनी दमदार और सुरीली आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मुझे क्या बेचेगा रुपैया, बेदर्दी राजा जरा पास तो आजा, कजरा मोहब्बत वाला, झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में जैसे लोकप्रिय गीतों पर पूरा पंडाल झूमता नजर आया।
उन्होंने बेखौफ आजाद है जीना मुझे, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी जैसे देशभक्ति गीत गाकर जोश भर दिया। वहीं जग मंगल गाए शिव पार्वती का मिलन विवाह और अयिगिरि नन्दिनि नन्दितमेदिनि जैसे भजनों से वातावरण भक्तिमय हो गया। कार्यक्रम के दौरान सोना मोहपात्रा ने हिंदी साहित्य की महान कवयित्री महादेवी वर्मा को भी याद किया। बीच-बीच में श्रोताओं से संवाद करते हुए उन्होंने कहा कि तीन साल में यह मुरादाबाद में उनका दूसरा शो है और शहर में इस दौरान काफी बदलाव देखने को मिला है।
इसके बाद उन्होंने जिया लागे न तुम बिन मोरा, ऐ वे मौला अली वाली जुगनी जी, तोसे नैना लागे पिया सांवरे, अंबरसरिया मुंडिया वे, मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे जैसे गीतों से समां बांध दिया। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म धुरंधर का गीत न तो कारवां की तलाश है, गाकर उन्होंने कार्यक्रम का समापन जोश और तालियों के बीच किया।
तहजीब और मुशायरा का शहर है मुरादाबाद, तीन साल में बदल गया स्वरूप
सोना मोहपात्रा ने कहा कि तीन साल पहले और अब के मुरादाबाद में बड़ा फर्क नजर आता है। शहर की हवा, सड़कें और व्यवस्थाएं बदली हुई दिखती हैं। कहा कि मुरादाबाद अब पहले से ज्यादा सुसज्जित और जीवंत नजर आता है। श्रोताओं से मिले प्यार और उत्साह ने उन्हें खास तौर पर प्रभावित किया। कहा कि ये तहजीब और मुशायरा का शहर है। यहां से कई फनकार निकले जिन्होंने दुनिया भर में पीतलनगरी का नाम रोशन किया।
सांस्कृतिक चेतना ने रचा जनसंवाद का विराट कैनवास
उदीषा चौपाला साहित्योत्सव के तीसरे दिन ने संवाद, सृजन और सुरों की उजास के साथ एक भव्य सांस्कृतिक अनुभव का रूप ले लिया। खुले मौसम और अनुकूल वातावरण ने दर्शकों को स्वतः ही आयोजन स्थल और मंचों की ओर आकर्षित किया। जिला प्रशासन, पीतल नगरी महोत्सव समिति और पूर्वांचलवासी संस्था के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस महोत्सव में साहित्य, लोक, पत्रकारिता, रंगमंच और संगीत हर विधा में श्रोताओं की सक्रिय मौजूदगी ने उदीषा को एक बार फिर एक सामूहिक, समावेशी और गौरवपूर्ण सांस्कृतिक उत्सव के रूप में स्थापित किया।
सुबह के सत्र की शुरूआत सृजनात्मक लेखन कार्यशाला से हुई, जिसमें प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मधु पंत ने लेखन की बारीकियों, संवेदना और अभिव्यक्ति के शिल्प पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि रचनात्मक लेखन केवल भाषा का कौशल नहीं है, बल्कि यह जीवन को देखने, समझने और महसूस करने की एक व्यापक दृष्टि है। इस सत्र में युवाओं की विशेष और उत्साहपूर्ण उपस्थिति रही। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान लेखन से जुड़ी गंभीर, सार्थक और व्यावहारिक जिज्ञासाओं ने कार्यशाला को अधिक प्रभावशाली बना दिया। सत्र का संचालन रश्मि शर्मा ने किया। दोपहर के सत्रों में विचारों और विमर्श का दायरा और अधिक विस्तृत तथा गहन होता चला गया।
‘रस, रिवायत और रसोई’ विषयक संवाद में सदफ़ हुसैन और ईशान शर्मा ने भोजन को संस्कृति, स्मृति और पहचान से जोड़ते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि रसोई किसी भी समाज की जीवित विरासत होती है, जिसमें इतिहास, परंपरा और भावनाएँ एक साथ पकती और संजोई जाती हैं। इस संवाद ने भोजन को केवल स्वाद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के रूप में स्थापित किया। इस सत्र की मॉडरेटर तराना खान रहीं।
इसी समय जौन एलिया मंच पर आयोजित ‘आकाशवाणी और एफएम की बदलती दुनिया’ विषयक सत्र में रेहान फ़ज़ल और ऋतु राजपूत ने रेडियो के बदलते स्वरूप, उसकी सामाजिक भूमिका और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल दौर के बावजूद रेडियो की आत्मीयता, भरोसा और पहुंच आज भी बनी हुई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि रेडियो समाज के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने का एक सशक्त माध्यम है। इस संवाद में डॉ. प्रदीप शर्मा और अंजुम शर्मा ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई।
दोपहर में उर्दू ग़ज़ल: कल, आज और कल’ विषयक संवाद में डॉ. आबिद हैदरी, ज़िया ज़मीर और कृष्ण कुमार नाज़ ने मुरादाबाद की ग़ज़ल परंपरा की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि मुरादाबाद की ग़ज़ल केवल साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक स्मृति, संवेदना और पहचान का अभिन्न हिस्सा है। डॉ. मोहम्मद आसिफ हुसैन ने इस संवाद का संचालन किया
डिजिटल युग में बाल साहित्य पर संवाद आयोजित हुआ, जिसमें डॉ. मधु पंत, उपासना, रश्मि शर्मा और संभल जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैंसिया ने बच्चों की बदलती दुनिया और साहित्य की भूमिका पर गंभीर और सार्थक विचार रखे। वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आने वाली पीढ़ी को साहित्य से जोड़ना आज की पीढ़ी की सांस्कृतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। इस सत्र का संचालन अच्युत सिंह ने किया।
स्थानीय संस्कृति व जमीनी संवेदनाओं की प्रासंगिकता रेखांकित
‘माटी, बोली और मानुष’ विषयक संवाद में वशिष्ठ अनूप, भालचंद्र तिवारी और जयकांत सिंह ने लोकभाषाओं, स्थानीय संस्कृति और जमीनी संवेदनाओं की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि लोकबोध ही समाज की वास्तविक आत्मा को प्रतिबिंबित करता है। इस संवाद के मॉडरेटर कमलेश राय रहे।
नौटंकी ‘सुल्ताना डाकू’ ने दर्शकों को रोमांचित किया
शाम को नौटंकी ‘सुल्ताना डाकू’ की प्रस्तुति ने दर्शकों को लोकनाट्य की सशक्त और जीवंत परंपरा से रूबरू कराया। पारंपरिक संवाद शैली, सजीव गायन, ढोलक-नगाड़े की थाप और भावपूर्ण अभिनय ने मंच को पूरी तरह जीवंत कर दिया। सुल्ताना डाकू के चरित्र के माध्यम से अन्याय, प्रतिरोध और लोकनायक की छवि को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। कलाकारों की सशक्त संवाद अदायगी और पारंपरिक वेशभूषा ने उत्तर भारतीय नौटंकी परंपरा के मूल स्वरूप को सामने रखा। इसी क्रम में ‘मुरादाबाद की नई कविता’ ओपन माइक सत्र में स्थानीय और युवा कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से शहर की समकालीन संवेदनाओं, सवालों और अनुभवों को स्वर दिया।
सत्य को समाज के बीच रखें आज के पत्रकार: सौरभ द्विवेदी
सोशल मीडिया के समय में पत्रकारिता विषयक संवाद में वरिष्ठ पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने कहा कि तकनीक के बढ़ते दबाव के बावजूद पत्रकारिता की आत्मा आज भी सत्य, विश्वसनीयता और जिम्मेदारी में ही निहित है। उन्होंने युवाओं से सवाल पूछने की आदत विकसित करने, तथ्यों की गंभीर जांच करने और ज़मीनी स्तर पर जाकर रिपोर्टिंग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सूचनाओं की अत्यधिक बाढ़ के इस दौर में पत्रकारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता का कार्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज के सामने सही और प्रामाणिक तथ्य प्रस्तुत करना है, जिससे जनता भ्रम से बाहर निकल सके।
जेन ज़ी को चाहिए ज्ञान और मनोरंजन में संतुलन : चेतन भगत
‘जेन ज़ी की कहानियां’ सत्र में चर्चित लेखक चेतन भगत ने युवाओं से सीधे संवाद के माध्यम से उनके मन, रिश्तों, करियर और सपनों की उलझनों पर खुलकर बातचीत की। उनकी बातें युवाओं के अनुभवों और वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ती चली गईं।
उन्होंने कहा कि आज का युवा विकल्पों की भरमार के बीच निर्णय लेने में असमंजस का सामना कर रहा है। आज की पीढ़ी किताबों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपने सवालों के जवाब और अपनी भावनाओं की सच्चाई तलाशती है। ज्ञान और मनोरंजन के संतुलन पर उन्होंने कहा कि जीवन में दोनों आवश्यक हैं। सत्र में पूर्वांचल वासी संस्था के अध्यक्ष विवेक ठाकुर और अंजुम शर्मा ने कई उनसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बात की और कई अनुभव साझा किए।
वागीश्वर मंच के सामने लोक संस्कृति के रंग
वागीश्वर मंच के सामने बने मंच पर लोकसंस्कृति के विविध रंग देखने को मिले। कभी राजस्थानी लोक की सुर लहरियां गूंजीं, तो कभी अयोध्या के फाग ने माहौल को होली के रंगों से सराबोर कर दिया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न अंचलों की लोक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को राज्य की सांस्कृतिक विविधता से रूबरू कराया। लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक वेशभूषा ने उदीषा–2026 को जमीनी संस्कृति से गहराई से जोड़ा और आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान प्रदान की।
