संपादकीय: अवसरों का द्वार
जब दुनिया संरक्षणवाद, टैरिफ़ युद्ध और आपूर्ति शृंखलाओं की अनिश्चितता से जूझ रही हो, तब विश्व व्यापार के लगभग एक-तिहाई और वैश्विक जीडीपी के करीब 25 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का साथ आना स्वाभाविक रूप से ऐतिहासिक महत्व रखता है। दो अरब से अधिक लोगों को प्रभावित करने वाली यह साझेदारी आर्थिक ही नहीं, भू-राजनीतिक समीकरणों पर भी असर करेगी।
यह समझौता साफ संकेत है कि वैश्विक चुनौतियों का टिकाऊ समाधान टकराव नहीं, सहयोग है। ऐसे समय में जब अमेरिका में ट्रंप की नीतियों के तहत ऊंचे टैरिफ़ और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की सोच ने पारंपरिक व्यापारिक ढांचे को झकझोरा है, भारत-ईयू समझौता उस का संतुलित जवाब है। यह किसी के विरुद्ध गठबंधन नहीं, बल्कि नियम-आधारित, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के समर्थन में एक पहल है।
अमेरिका नाराज है, क्योंकि लंबे समय से अटका यह समझौता ऐसे दौर में आगे बढ़ा, जब वॉशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच व्यापारिक मतभेद उभरे, हालांकि इससे अमेरिका-यूरोप संबंध निर्णायक रूप से नहीं बिगड़ने वाले पर वॉशिंगटन का दबदबा कुछ कम होगा। यदि भारतीय निर्यात को यूरोप में व्यापक बाजार पहुंच मिलती है तो ट्रंप टैरिफ़ से हुए संभावित नुकसान की भरपाई इससे आंशिक रूप से संभव है।
इस डील के बाद अब अमेरिका के साथ भी संतुलित और पारस्परिक हितों पर आधारित व्यापार समझौते की संभावना बढ़ती है। यूरोपीय संघ अमेरिकी बाजार का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता, पर वह विविधीकरण का एक मजबूत स्तंभ अवश्य बन सकता है। समझौता पंचवर्षीय परिवर्तनकारी एजेंडे के देखना ठीक है, क्योंकि यह केवल टैरिफ़ घटाने का मामला नहीं, बल्कि मानकों, तकनीक, आपूर्ति शृंखला, डिजिटल व्यापार और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में गहरे सहयोग का ढांचा है।
यदि जीएसपी जैसी रियायतों की बहाली या समान प्रावधान शामिल होते हैं, तो वस्त्र, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प, जूते और समुद्री उत्पादों को बड़ा लाभ मिलेगा, जिससे परिधान उद्योग में चीन, बांग्लादेश और वियतनाम के साथ प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति सुदृढ़ हो सकती है, बशर्ते हम गुणवत्ता और लागत दोनों में प्रतिस्पर्धी बनें। इंजीनियरिंग, ऑटो कंपोनेंट और मशीनरी क्षेत्र को यूरोपीय तकनीक और मानकों से तालमेल का अवसर मिलेगा। सेवा क्षेत्र विशेषकर आईटी, फिनटेक और प्रोफेशनल सेवाएं को। यदि वीजा और मूवमेंट ऑफ प्रोफेशनल्स में लचीलापन मिलता है, तो भारतीय युवाओं के लिए नए अवसर खुल सकते हैं। सेमीकंडक्टर तकनीक और हरित प्रौद्योगिकी में सहयोग भारत के औद्योगिक उन्नयन को गति दे सकता है।
रक्षा क्षेत्र में यूरोपीय संघ के बाजार तक पहुंच और संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं निजी भारतीय कंपनियों के लिए नए द्वार खोल सकती हैं। फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देशों की कंपनियों द्वारा भारत में रक्षा कॉम्प्लेक्स स्थापित करने से ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिल सकता है। साथ ही इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी गति मिलना स्वाभाविक है। इसके लागू होने में डेढ़ बरस लग सकते हैं, पर यह समझौता अवसरों का द्वार है।
