‘रॉक मैग्नेटिज़्म इन अर्थ साइंसेज़’ कार्यशाला में बोले विशेषज्ञ, पृथ्वी के चुंबकीय गुण से पक्षियों को मिलती है दिशा की जानकारी
लखनऊ, अमृत विचार : भूविज्ञान और पृथ्वी विज्ञान के छात्रों व शोधकर्ताओं को रॉक मैग्नेटिज़्म से जुड़ी आधुनिक तकनीकों और उनके उपयोग की जानकारी देने के उद्देश्य से बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान में कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने मिट्टी और शैलों में मौजूद चुंबकीय गुणों के अध्ययन से पृथ्वी के प्राचीन चुंबकीय क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय बदलावों को समझने पर विस्तृत चर्चा की। संस्थान के निदेशक प्रो. एमजी ठक्कर ने कहा कि पक्षी बिना दिशा के उड़ान नहीं भरते, बल्कि वे पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग कर दिशा-निर्धारण करते हैं, जिसे ‘मैग्नेटोरिसेप्शन’ कहा जाता है।
कार्यशाला में डॉ. बिनिता फर्तियाल ने बताया कि बीएसआईपी की पुराचुंबकत्व प्रयोगशाला अब एक प्रमुख राष्ट्रीय सुविधा के रूप में कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि पहली बार इस प्रयोगशाला द्वारा रॉक मैग्नेटिज़्म पर क्षमता-निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई है। इसका उद्देश्य प्रतिभागियों को रॉक मैग्नेटिज़्म की बुनियादी जानकारी देना है, जिसमें क्षेत्र से नमूने एकत्र करना, प्रयोगशाला में उनकी तैयारी तथा आधुनिक विश्लेषण तकनीकों का प्रशिक्षण शामिल है। वैज्ञानिक डॉ. मोहम्मद आरिफ ने बताया कि रॉक मैग्नेटिज़्म का उपयोग पुराचुंबकत्व, भूस्तरीय दिनांकन, प्लेट विवर्तनिकी और पुराजलवायु अध्ययन में किया जाता है।
मिट्टी का चुंबकीय तत्व जलवायु और प्रदूषण भी बताता है
पंजाब विश्वविद्यालय के एमरिटस प्रोफेसर प्रो. अशोक सहनी ने बताया कि 1980 के दशक से पहले दक्कन इंटरट्रैपियन शैलक्रमों को इओसीन काल का माना जाता था, लेकिन बाद में इन निक्षेपों से डायनासोर की अस्थियां, अंडों के खोल और दांत मिलने पर इन्हें क्रेटेशस काल का माना गया। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय चुंबकत्व का उपयोग मिट्टी बनने की प्रक्रिया, धूल के स्रोतों की पहचान और प्रदूषण की निगरानी में भी किया जाता है।
