प्राचीन तीर्थों में प्रमुख संभल
सृष्टि के आरंभ में ही भगवान विश्वकर्मा ने अड़सठ तीर्थों और उन्नीस पुण्य- कूपों के सहित संभल तीर्थ का निर्माण किया था। सत्ययुग में इसका नाम ‘सत्यव्रत ‘, त्रेता में ‘महद्गिरि’, द्वापर में ‘पिंगल’ और अब कलियुग में ‘शम्भल ‘है। शम्भल आजकल ‘सम्भल ‘नाम से प्रसिद्ध है। सम्भल - माहात्म्य और अन्य पुराणों में भी तालव्य शकार से ‘शम्भल ‘नाम का उल्लेख है, किंतु आजकल दन्त्य मकार वाला ‘संभल’ नाम ही प्रचलित है। यह इसलिए है, क्योंकि कुछ लोग तालव्य ‘शकार का उच्चारण नहीं कर पाते। ऐसा माना जाता है कि ‘शंभल ‘ और ‘संभल’ दोनों ‘शम्भ्वालय’ शब्द के अपभ्रंश हैं। ‘शम्भ्वालय’ शब्द से ‘शंभु का आलय’ अर्थ स्पष्ट ध्वनित होता है। इसे गुप्त रखने के लिए ही इस स्थान को ‘शंभल’ कहा जाता है। -गौरीशंकर वैश्य विनम्र
पृथ्वीराज चौहान की राजधानी
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संभल अति प्राचीनकाल से पावन भगवद्धाम के रूप में प्रसिद्ध रहा है। आधुनिक शोधकर्ताओं ने भी इस पर व्यापक रूप से प्रकाश डाला है। प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर छठी शताब्दी में हर्ष के शासनकाल में संभल में ब्राह्मणों की प्रधानता थी और उनके माध्यम से ज्ञान का सूर्य संभल में उदयाचल के शिखर पर चमक रहा था। डॉ. ब्रजेन्द्रमोहन शांख्यधर के अनुसार ईसा की बारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पृथ्वीराज चौहान का संभल में आधिपत्य था तथा उनकी पुत्री बेला वहां सती हुई थी। उन्होंने शत्रुओं पर आक्रमण करने के लिए और उनके आक्रमणों से बचने के लिए संभल को अपनी राजधानी भी बनाया था। यहां सुरंगों के माध्यम से अपनी रक्षा का प्रबंध किया गया था। यहां दिल्ली, अजमेर और कन्नौज को जाने वाली सुरंगें थीं। खुदाई होने पर अब कहीं-कहीं उनके चिह्न मिलते हैं।
तीनों कोनों पर स्थापित शिवलिंग
संभल माहात्म्य के पढ़ने से ज्ञात होता है कि पूरा संभल हरि-मंदिर ही है। इसके तीनों कोनों पर तीन शिवलिंग स्थापित हैं। दक्षिण में सम्भलेश्वर, पूर्व में चन्द्रेश्वर और उत्तर में भुवनेश्वर। इन तीन कोनों वाले संभल की बाहरी परिक्रमा चौबीस कोस की है। प्रत्येक कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्थी-पंचमी को इस परिक्रमा में हजारों नर-नारी सम्मिलित होते हैं। इसके बारह कोस के भीतरी क्षेत्र में अड़सठ तीर्थ और उन्नीस कूप हैं। इसके इतने बड़े आकार में ब्रह्मा जी का निवास है। इसके ठीक मध्य में तलवार हाथ में लिए, घोड़े पर सवार श्रीकल्कि भगवान की दिव्यमूर्ति से सुशोभित ‘हरिमंदिर’था, जिसे मध्यकाल में विधर्मी आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस स्थान के निकट एक बैष्णव मंदिर का निर्माण करवाया, जो अब श्रीविष्णु कल्कि मंदिर नाम से प्रसिद्ध हैं। कल्कि पुराण तृतीय अंश 18 अध्याय, श्लोक 4 में स्पष्ट उल्लेख है -यत्राष्टषष्टितीर्थानां सम्भवः शम्भलेभवत्। मृत्योर्मोक्षः क्षितौ कल्केरकलस्य पदाश्रयात्।। अर्थात् जहां अड़सठ तीर्थों का संभव हुआ है, वह तीर्थ शिरोमणि सम्भल भगवान, कल्कि के चरणों के प्रताप से मोक्ष का धाम है।
पुराणों में वर्णित संभल
कल्कि पुराण में कल्कि भगवान के संभल में अवतरण की विस्तृत कथा वर्णित है। श्लोक 1/1/15 कहता है - प्रलयकाल के अंत में जगत की सृष्टि करने वाले लोकपितामह ब्रह्मा अपनी पीठ से भयंकर मलिन पातक की सृष्टि की, वह अधर्म नाम से विख्यात हुआ। उस अधर्म का प्रचार आरंभ होते ही सब देवता दुखी होकर श्रीनारायण को भूमंडल की दुर्दशा सुनाते हैं। तब विष्णु भगवान संभल (उत्तर प्रदेश) में विष्णुयशा ब्राह्मण के यहां अपने अवतार का वचन देते हैं। लक्ष्मी जी सिंहलद्वीप में बृहद्रथ राजर्षि की धर्मपत्नी कौमुदी की कोख से जन्म लेती हैं। इनका नाम ‘पद्मा’ है।
कल्कि भगवान का वैशाखमास के शुक्लपक्ष की द्वादशी के दिन कन्या लग्न में अवतार होता है। भगवान चतुर्भुजरूप से माता-पिता को दर्शन देकर ब्रह्मा जी की प्रार्थना से द्विभुज रूप धारण करते हैं। भगवान शिव के द्वारा भेजे गए वेदमय शुक के माध्यम से सिंघलद्वीप में पद्मावती के स्वयंवर का समाचार प्राप्त कर श्रीकल्कि भगवान उस स्वयंवर में पधारे। वहां लक्ष्मी रूपिणी के साथ श्रीकल्कि भगवान का विवाह संस्कार संपन्न हुआ। पद्मावती को साथ लेकर भगवान कल्कि ने विश्वकर्मा द्वारा सुसज्जित संभल नगर में प्रवेश किया। श्रीहरि की यह अवतारकथा परममंगलकारिणी है, जैसा कि कल्कि पुराण में कहा गया है - कल्कि महाविष्णु के परम अद्भुत अवतार की यह कथा भक्तिपूर्वक पढ़ने और सुनने वालों के सभी अमंगलों का नाश करने वाली है।
