संपादकीय: महज एसओपी नहीं पर्याप्त
कई राज्यों के बजट से भी अधिक के डिजिटल धोखाधड़ी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘सरासर डकैती’ मानते हुए इससे बचाव के लिए केंद्र सरकार को पूरे देश में एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया अथवा एसओपी लागू करने का निर्देश स्वागत योग्य है। बेशक, बैंक यदि संदिग्ध लेनदेन पर ग्राहकों को सतर्क करते और साइबर अपराधों की पहचान तथा जांच के लिए अंतर-एजेंसी समन्वय मजबूत रखते तो आंकड़े अलग दिखते।
डिजिटल फ्रॉड के मामलों में सिर्फ तकनीक दोषी नहीं है, बल्कि जनता की अल्पज्ञता, लोभ–लालच और भय का भी इसमें बड़ा योगदान है। जल्दी धन प्राप्ति, आसान निवेश या तत्काल लाभ के लालच में वह कई बार चेतावनी संकेतों की अनदेखी करता है। साइबर जागरूकता का अभाव भी लोगों को ऐसी धोखाधड़ी का शिकार बनाता है। जागरूकता अभियान, विद्यार्थियों के लिए साइबर सुरक्षा शिक्षाएं और आम नागरिकों को साधारण फ्रॉड के तरीकों से परिचित कराना अब अत्यंत आवश्यक है।
दुर्भाग्य है कि इस खेल में बैंक भी शामिल दिखे। बैंकों को केवल लेनदेन का ‘ब्रोकरेज हब’ होने के बजाए ग्राहकों की सुरक्षा के लिए सक्रिय निगरानी और अलर्ट सिस्टम लागू करना चाहिए। यदि बैंक संदिग्ध अचानक बड़ी रकम निकासी या अनजान स्रोतों से फंड ट्रांसफर को समय पर नहीं चिन्हित करता तो यह उसकी कार्यगत विफलता है। अदालत ने भी माना कि बैंक अनजाने में अथवा मिलीभगत से ऐसे फ्रॉड को बढ़ावा दे रहे हैं। अदालत को केंद्र सरकार द्वारा एक एसओपी या एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया इसका अकसीर इलाज है, इस पर भी सवाल यह कि क्या किसी एक एसओपी के जरिये इतने बड़े और विविध स्तर पर होने वाले साइबर और डिजिटल वित्तीय अपराध को रोका जा सकता है?
आरबीआई ने पहले ही इस तरह की मानकीकृत संचालन प्रक्रिया तैयार कर रखी है, पर अपराध आज भी बेशुमार हैं। नये सिरे से व्यापक एसओपी तैयार करना एक स्वागतयोग्य सकारात्मक कदम है, लेकिन इसका प्रभाव तभी होगा जब इसे तकनीकी सक्षमता और व्यवहारिक तौर पर कड़ाई से लागू किया जाए। केवल कागजी मानकीकृत संचालन प्रक्रिया बनाकर लागू करने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। इस एसओपी को वित्तीय संस्थानों, बैंक अधिकारियों, टेलीकॉम पोर्टलों और साइबर पुलिस के बीच वास्तविक समय में डेटा साझा करने और त्वरित कार्रवाई की क्षमता के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
जैसा कि कोर्ट ने सुझाया है, एआई आधारित अलर्ट सिस्टम को निगरानी में शामिल करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपाय है। डिजिटल साधनों के विस्तार के अनुरूप डिजिटल प्राइवेसी के उल्लंघन के खिलाफ पर्याप्त कानून और सुरक्षा ढांचा विकसित नहीं हो पाया है। लाखों लोग एक ही फोन नंबर या ईमेल से कई प्लेटफॉर्म पर जुड़े हैं, जिससे फ्रॉड करने वालों को उपयोगकर्ता के प्रोफाइल तक आसानी से पहुंच मिल जाती है। आवश्यकता है कि डेटा सुरक्षा कानून को अधिक स्पष्ट, उपयोगकर्ता-केंद्रित और सख्त बनाया जाए और इसका पालन भी सुनिश्चित हो। एसओपी के कड़ाई से पालन से कुछ मामलों को तो रोका जा सकता है, लेकिन यह पूर्ण समाधान नहीं है।
