संपादकीय : डिजिटल संप्रभुता का संदेश
डिजिटल युग में नागरिकों की निजता और तकनीकी कंपनियों के कारोबारी मॉडल के बीच खिंचाव अब खुलकर सामने आ गया है। यह मामला केवल एक कंपनी का नहीं, बल्कि भारत की उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेटा को यह कहना कि ‘देश का कानून मानो या बाहर जाओ’ महज टिप्पणी नहीं, डिजिटल संप्रभुता का स्पष्ट संदेश है। यह टिप्पणी उस समय आई है, जब व्हाट्सएप और मेटा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने और निर्देशों को चुनौती दे रहे हैं।
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने 2021 की व्हाट्सएप प्राइवेसी पॉलिसी के तहत अनिवार्य डेटा शेयरिंग को प्रतिस्पर्धा-विरोधी मानते हुए मेटा पर जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यूजर्स का डेटा अन्य मेटा कंपनियों के साथ साझा न किया जाए। कंपनी का तर्क था कि यह डेटा सेवाओं को बेहतर बनाने और एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करने के लिए आवश्यक है, लेकिन पहले आयोग और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रश्न यह है कि क्या सेवा सुधार के नाम पर उपयोगकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी को व्यापक व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? यह विवाद केवल डेटा गोपनीयता का नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा और डेटा के आर्थिक मूल्य का भी है।
आज डेटा ‘नया तेल’ कहा जाता है। उपयोगकर्ता की आदतें, लोकेशन, संपर्क और व्यवहार सबका मौद्रिक मूल्य है। यदि यह जानकारी उपयोगकर्ता की स्पष्ट और समझी हुई सहमति के बिना साझा होती है, तो यह केवल निजता का उल्लंघन नहीं, बल्कि उसकी डिजिटल संपत्ति का दोहन भी है। अदालत का स्पष्ट संकेत है कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार तकनीकी विस्तार के साथ कमजोर नहीं हो सकते। ‘टेक्नोलॉजी के युग में डेटा शेयरिंग अनिवार्य है’- यह तर्क न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया।
यह टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि यह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को याद दिलाती है कि सुविधा और नवाचार का अर्थ अधिकारों से समझौता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यूजर कंसेंट और ऑप्ट-आउट के तर्क पर भी सवाल उठाना सही था, क्योंकि बड़ी टेक कंपनियों की प्राइवेसी पॉलिसी नागरिकों की समझ से परे जटिल भाषा में होती है। ऐसे में ‘सहमति’ कितनी स्वैच्छिक है, यह गंभीर प्रश्न है। यदि सहमति अस्पष्ट और असंतुलित है, तो वह वैधानिक सुरक्षा नहीं दे सकती। यह टिप्पणी भविष्य में सभी डिजिटल कंपनियों के लिए चेतावनी है कि पारदर्शिता और सरलता अनिवार्य होगी।
भारत मेटा के लिए सबसे बड़ा बाजार है, जहां 50 करोड़ से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, इसलिए यह मामला केवल कानूनी नहीं, आर्थिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पक्षकार बनाने का आदेश इस बात का संकेत है कि अदालत इस विवाद को व्यापक नीति-प्रश्न के रूप में देख रही है। नौ फरवरी का अंतरिम आदेश भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। यदि न्यायालय स्पष्ट रूप से निजता और प्रतिस्पर्धा की रक्षा को पूर्ण प्राथमिकता देता है, तो यह न केवल मेटा बल्कि सभी वैश्विक टेक कंपनियों के लिए नजीर बनेगा।
