संपादकीय: सुखद आर्थिक संकेत
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 एक ऐसे समय में आया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार विखंडन और वित्तीय अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे विकट समय में यह सुखद है कि 7.4% वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान भारत को लगातार चौथे वर्ष सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करता है। यह उपलब्धि भारतीय बाजार के आत्मविश्वास को मजबूत करती है, किंतु इसके सामाजिक और संरचनात्मक आयामों का संतुलित मूल्यांकन आवश्यक है। मांग और निवेश विकास का दोहरा इंजन है। ऐसे में निजी उपभोग का 7% की वृद्धि यह संकेत देती है कि अपेक्षाकृत कम मुद्रास्फीति और स्थिर रोजगार ने क्रयशक्ति को सहारा दिया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि की मजबूती और शहरी क्षेत्रों में मांग का आधार विस्तृत हुआ है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 7.8% वृद्धि और पूंजीगत व्यय का 4% तक पहुंचना अवसंरचनात्मक विकास को बल देगा, जिससे भविष्य में निर्माण, स्टील, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों को लाभ होगा, हालांकि उच्च सार्वजनिक पूंजीगत व्यय के साथ राज्यों का बढ़ता राजकोषीय घाटा जो तकरीबन सवा तीन फीसद है, चिंताजनक है। दीर्घकालिक वित्तीय अनुशासन के लिए यह एक चेतावनी है। यदि विकास ऋण-निर्भर हो जाए, तो भविष्य में ब्याज भार सामाजिक व्यय को सीमित कर सकता है।
बैंकों का बट्टा खाता या जीएनपीए 2.2% और निवल एनपीए 0.5% तक गिरना वित्तीय क्षेत्र की सुदृढ़ता का संकेत है। 55 करोड़ जनधन खाते, 36 लाख करोड़ से अधिक मुद्रा ऋण वितरण और 21.6 करोड़ डीमैट खाते इस क्षेत्र की स्थिरता और समावेशन सत्यापित करते हैं। यह आंकड़ा बाजार में वित्तीय भागीदारी के विस्तार को दर्शाता है कि निवेश संस्कृति और उद्यमिता को बल मिला है, हालांकि खुदरा निवेशकों की तेज़ी से बढ़ती संख्या पूंजी बाजार में अस्थिरता के जोखिम भी लाती है। सेवाओं का निर्यात 387.6 अरब डॉलर तक पहुंचना भारत की तकनीकी और पेशेवर क्षमता को दर्शाता है।
परंतु माल व्यापार घाटा अभी भी चुनौती है। सेवा-आधारित वृद्धि टिकाऊ है, पर विनिर्माण के बिना व्यापक रोजगार सृजन कठिन रहेगा। रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन और बागबानी क्षेत्र का विस्तार ग्रामीण आय को सहारा देते लगते हैं। पीएम-किसान के तहत 4.09 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण उनकी आय सुरक्षा को मजबूत करता है, लेकिन आय-सहायता दीर्घकालिक उत्पादकता सुधार का विकल्प नहीं हो सकती। रोजगार के मोर्चे पर 56.2 करोड़ कार्यरत आबादी और विनिर्माण में 6% वृद्धि सकारात्मक संकेत तो हैं। सेमीकंडक्टर मिशन और एआई पारिस्थितिकी तंत्र दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित कर सकते हैं, परंतु तकनीकी परिवर्तन से पारंपरिक रोजगारों पर दबाव भी बढ़ेगा।
आर्थिक सर्वेक्षण एक सशक्त, विविध और लचीली अर्थव्यवस्था की तस्वीर प्रस्तुत करता है। बाजार के लिए यह विश्वास और विकास का दस्तावेज़ है, पर विकास की यह रफ्तार तभी सार्थक होगी, जब वृद्धि के लाभ समान रूप से वितरित हों, राजकोषीय अनुशासन कायम रहे और रोजगार सृजन केंद्र में रहे। अन्यथा ऊंची वृद्धि दर सामाजिक असमानता की खाई को गहरा सकती है।
