कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध तस्करी से जुड़े मामले के आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

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Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोडीन युक्त कफ सिरप की अवैध तस्करी से जुड़े एक मामले में आरोपियों को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में कफ सिरप का भंडारण और परिवहन “चिकित्सीय उपयोग” की अवधारणा के विपरीत है। बड़ी मात्रा में कोडीन आधारित कफ सिरप की बरामदगी प्रथम दृष्टया एनडीपीएस अधिनियम के गंभीर उल्लंघन की ओर इशारा करती है और ऐसे मामलों में कठोर प्रावधानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने इस संदर्भ में प्रावधानों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति किसी छूट या रियायत का दावा करता है, उसकी यह जिम्मेदारी होती है कि वह यह सिद्ध करे कि वह ऐसी छूट या रियायत पाने का पात्र है। यदि कोई छूट कुछ विशेष शर्तों के पालन पर उपलब्ध है, तो उन शर्तों का अक्षरशः पालन अनिवार्य है। किसी भी शर्त का उल्लंघन होने पर दावा करने वाला व्यक्ति उस छूट से वंचित हो जाता है।

वर्तमान मामले में कोडीन युक्त कफ सिरप की अत्यधिक मात्रा बरामद की गई है, जिसे अवैध रूप से प्रयोग किया गया था,  जिससे ‘चिकित्सीय प्रयोजन में स्थापित उपयोग’ की शर्त का स्पष्ट उल्लंघन होता है और परिणामस्वरूप याचियों को उक्त छूट का लाभ नहीं दिया जा सकता है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकलपीठ ने अब्दुल कादिर व अन्य की याचिका खारिज करते हुए पारित किया।

रामपुर के पुलिस स्टेशन कोतवाली में  एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/21 तथा भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप था कि आरोपियों के कब्जे से 119 पेटियों में भरी 11,885 बोतल कोडेक्टस टीआर (कोडीन फॉस्फेट युक्त कफ सिरप) बरामद की गई। ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद दोनों आरोपी सितंबर 2025 से जेल में बंद हैं।

याचियों के अधिवक्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपी के पास थोक दवाओं के कारोबार का वैध लाइसेंस है और संबंधित कफ सिरप चिकित्सीय उपयोग के लिए अनुमन्य श्रेणी में आता है, इसलिए एनडीपीएस अधिनियम लागू नहीं होता। यह भी कहा गया कि केमिकल जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है और नमूनाकरण की प्रक्रिया में खामियां हैं।

हालांकि सरकारी अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि बरामद मात्रा न केवल लाइसेंस शर्तों से कहीं अधिक है, बल्कि सरकारी अधिसूचनाओं में निर्धारित अधिकतम भंडारण सीमा का भी स्पष्ट उल्लंघन है। अपर महाधिवक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि कोडीन युक्त दवाओं का दुरुपयोग नशे के रूप में तेजी से बढ़ रहा है, जिसे रोकना जनहित में आवश्यक है।

अंत में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कोडीन ‘नारकोटिक ड्रग’ की श्रेणी में आता है और चिकित्सीय अपवाद का लाभ तभी मिल सकता है, जब सभी शर्तों का सख्ती से पालन किया गया हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक मात्रा से कहीं अधिक बरामदगी के कारण वर्तमान मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के कठोर प्रावधान लागू होते हैं और इस स्तर पर आरोपियों को जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता है। अतः कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी।

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