विंडरमेयर थिएटर फेस्टिवल: विकास के नाम पर इंसानियत खोते समाज को दिखाया आईना
बरेली, अमृत विचार। विंडरमेयर थिएटर फेस्टिवल के पांचवें दिन मुंबई से आए अर्थ थिएटर के कलाकारों ने शुक्रवार देर शाम ''बोरो होर मर चुका है'' नाटक का मंचन किया। आदिवासियों से भेदभाव के विषय पर बात करती यह प्रस्तुति दक्षिण अफ्रीकी नाटक ''सिजवे बान्जी इज डेड'' पर आधारित है, जिस एथॉल फुगार्ड ने वहां के दो जाने-माने अभिनेताओं (जॉन कानी और विंस्टन नित्शोना) के साथ मिलकर लिखा था।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और भारतीय समाज में आदिवासियों से भेदभाव की कड़ी जोड़ने का काम युवा कलाकार गगन श्रीवास्तव ने किया है, जो नाटक के निर्देशक भी हैं और इसमें अभिनय भी करते हैं। ''बोरो होर मर चुका है'' एक ऐसे आदिवासी की कहानी है, जिसे यह तय करना है कि वो सचमुच जिंदा रहना चाहता है या उसे कागजों पर भी अपना वजूद बचाए रखना है। यह नाटक एक ऐसे समाज को आईना दिखाता है जहां विकास की कीमत इंसानियत से चुकाई जाती है, जहां रोजी-रोटी की तलाश में घर से पलायन करने वाले आदिवासी अपनी पहचान खोकर जिंदा रहने को मजबूर हैं। लिहाजा, बोरो होर खुद ही घोषणा कर देता है कि वो मर चुका है।
इन्होंने किया अभियन
गगन श्रीवास्तव, संजय के. साहु और जयहिंद कुमार ने सधे हुए अभिनय से नाटक को बेहद प्रभावी बनाया। गीत-संगीत मोहन सागर का है, जिसे चिन्मय मुनघाटे ने स्वर दिया है। प्रसून भार्गव ने परकशन और अभि श्रीवास्तव ने साइड रिदम दी। कोरस में देबाश्री भट्टाचार्य, ऋषिकेश कदम, सुधांशु गिरि और किरण साहु ने स्वर दिए। उज्जवल कुमार की सीनोग्राफी और पूजा शेडे की कोरियोग्राफी ने प्रस्तुति को और प्रभावी बनाया। गोपाल मिश्रा ने सहायक निर्देशक और प्रोडक्शन मैनेजर की जिम्मेदारी निभाई। लाइट ऑपरेशन गोपाल मिश्रा और साउंड ऑपरेशन ध्रुवि गांगिल ने किया।
