संपादकीय: बहुप्रतीक्षित निर्णय

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

रक्षा खरीद परिषद द्वारा 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की मंजूरी से वायुसेना की क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। उम्मीद है कि अगले तीन साल के भीतर ही हमें शुरुआती तौर पर विमानों की आपूर्ति होने लगे और सात साल के भीतर ही हम देश में ही 60 फीसद स्वदेशी कल पुर्जों से राफेल विमान बनाने भी लगें। ऐसे में यह सौदा हमारी हवाई शक्ति को पुनर्स्थापित करने के साथ स्वदेशी रक्षा उद्योग को भी गति देगा।

 रक्षा आधुनिकीकरण, तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ाने वाला यह कदम वैश्विक सुरक्षा संरचना में भारत की भूमिका को मजबूत करने, फ्रांस के साथ रणनीतिक सहयोग गहराने के अलावा सामरिक संतुलन और वैश्विक रक्षा साझेदारियों के पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा। इससे सैन्य क्षमता में ही नहीं भारत की रक्षा-उद्योग प्रतिष्ठा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ेगा। 

सौदे में राफेल के अलावा 6 पी-8आई समुद्री टोही विमान, तकनीकी हस्तांतरण सहित रूसी आईएल-76एमडी-90ए परिवहन विमान, टी-72 टैंक, एयरशिप हाई एल्टीट्यूड सूडो सेटेलाइट, एंटी-टैंक माइंस और डोर्नियर विमान भी शामिल हैं। ये सेना की लॉजिस्टिक, टोही एवं युद्ध क्षमता को मजबूत करेंगे, विशेषकर लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में। कुल मिलाकर तीनों सेनाओं का एकीकरण बढ़ेगा तथा आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिलेगा। 

ठीक है कि सौदा अब सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति के समक्ष जाएगा, जिसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े मामलों पर स्वीकृति प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज़ रहती है पर आमतौर पर तकनीकी-वित्तीय समीक्षाएं और विस्तृत वार्ता कुछ माह का समय लेती ही हैं, पर इस बार देरी की आशंका कम है, क्योंकि एक तो उसके अध्यक्ष खुद प्रधानमंत्री हैं, दूसरे फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भी दो दिन बाद ही आने वाले हैं, जो इस पर हस्ताक्षर करेंगे, हालांकि इस श्रेणी के युद्धक विमानों की खरीद का प्रस्ताव 13 साल पहले दिया गया था, पर वित्तीय और नीति निर्णयों में इतनी जटिलता थी कि कई दौर की समीक्षा और लागत-लाभ गहन विचार के बावजूद बात सिरे नहीं चढ़ सकी थी। 

कभी मेक-इन-इंडिया और तकनीकी हस्तांतरण पर विवाद तो कभी कोविड के दौर और उसके बाद वैश्विक उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला चुनौतियां, रक्षा क्षेत्र की पुनर्निर्माण प्रक्रिया में देरी ने इस सौदे को लंबित रखा, जबकि स्क्वाड्रन संख्या की कमी लंबे समय से वायुसेना के लिए लगातार चिंता का विषय थी। 2016 में हुई 36 विमानों की खरीद वाली पहली राफेल डील के बावजूद भारत की वायु सेना 42 स्क्वाड्रनों की अधिकृत ताकत के मुकाबले लगभग 29 स्क्वाड्रनों के स्तर पर काम कर रही है। 

इस सौदे के बाद वायु सेना की एयर सुपीरियोरिटी और ‘स्टैंड-ऑफ’ स्ट्राइक क्षमता में इज़ाफा होगा, समुद्री निगरानी और समुद्र में सामरिक क्षमता को बल मिलेगा। अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों में आधुनिक उपकरण से समग्र शक्ति में वृद्धि होगी। विमान निर्माण में 60 फीसदी ऐसे स्थानीय सामग्री और स्वदेशी कल पुर्जे के इस्तेमाल जिनकी गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय मानकों और फ्रांसीसी तकनीक-प्रशिक्षण नियंत्रणों के तहत सुनिश्चित होगी, दूरगामी निर्णय है। इससे भारत के रक्षा क्षेत्र में नवीनतम तकनीकी क्षमता विकसित होगी।