संपादकीय : सर्बिया संग एआई सेतु

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Published By Pradeep Kumar
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नई दिल्ली में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन ने यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि भारत अब वैश्विक तकनीकी विमर्श के हाशिये पर नहीं, अपितु उसके केंद्र में स्थापित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में संपन्न यह महासम्मेलन मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल कूटनीति और तकनीकी संप्रभुता का सशक्त घोषणापत्र है। इस मंच से विश्व को एक स्पष्ट संदेश गया है कि इक्कीसवीं सदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) केवल नवाचार का उपकरण नहीं रह गई है, बल्कि यह भू-राजनीतिक प्रभुत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा का मेरुदंड बन चुकी है।

सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण आयाम भारत का ‘नियमों के अनुपालन’ की भूमिका से निकलकर ‘नियम-निर्माता’ की भूमिका में अवतरित होना है। भारत ने अपने ‘डिजिटल पब्लिक गुड्स’ मॉडल, जिसमें आधार, यूपीआई और डिजिलॉकर जैसे आधारभूत ढांचे शामिल हैं, को जिस आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वह ग्लोबल साउथ के लिए एक आदर्श और व्यवहारिक विकल्प है। यह मॉडल पश्चिमी कॉरपोरेट एकाधिकार और चीनी राज्य-नियंत्रित तंत्र के बीच एक संतुलित, पारदर्शी और लोकतान्त्रिक मार्ग प्रशस्त करता है। कूटनीतिक दृष्टि से, विशेष रूप से सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्ज़ान्दर वूचिच के साथ हुई प्रधानमंत्री की बैठक के निहितार्थ गहरे और दूरगामी हैं। एआई, डिजिटल नवाचार और स्टार्टअप्स के क्षेत्र में सर्बिया के साथ बनी सहमति को केवल एक सामान्य द्विपक्षीय समझौते के रूप में देखना भूल होगी। वस्तुतः, सर्बिया यूरोप और एशिया के मध्य एक रणनीतिक सेतु है। यह साझेदारी भारतीय तकनीकी उद्यमों के लिए यूरोपीय बाजारों का प्रवेश-द्वार बन सकती है और ‘विश्वसनीय एवं उत्तरदायी एआई’ के भारतीय दृष्टिकोण को वैश्विक वैधता प्रदान करती है। डेटा संप्रभुता और साइबर सुरक्षा पर दोनों देशों का एकमत होना यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य की डिजिटल व्यवस्था बहुध्रुवीय होगी, न कि किसी एक धड़े के अधीन। शिक्षा और अनुसंधान में सहयोग के माध्यम से भारतीय मेधा को यूरोपीय अनुसंधान नेटवर्क तक पहुंच मिलना ‘ब्रेन ड्रेन’ को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने की दिशा में एक ठोस कदम है। यह ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे अभियानों को वैश्विक फलक पर विस्तार देने जैसा है। सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष ‘मानव-केंद्रित एआई’ पर भारत का नैतिक जोर था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि तकनीक का अंतिम लक्ष्य एल्गोरिद्म की श्रेष्ठता नहीं, बल्कि समाज के ‘अंतिम पायदान’ पर खड़े व्यक्ति का सशक्तिकरण होना चाहिए। ध्यातव्य है कि एआई प्रशासन के वैश्विक मानक तय करने में भारत की सक्रियता उसे एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करती है। यद्यपि डेटा गोपनीयता, ‘डीपफेक’ और एआई जनित भ्रामक सूचनाएं जैसी जटिल चुनौतियां विद्यमान हैं।

यह एआई शिखर सम्मेलन मात्र एक तकनीकी प्रदर्शनी न होकर भारत के रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रदर्शन है। सर्बिया सहित अन्य देशों के साथ हुए समझौते यह संकेत देते हैं कि एआई के इस युगांतरकारी दौर में भारत मूकदर्शक नहीं रहेगा, बल्कि वह तकनीक के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण और वैश्विक कल्याण की दिशा तय करने वाली एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरेगा।