वैज्ञानिक फैक्ट : भारहीन नहीं, फिर भी तैरते हैं बादल 

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Published By Anjali Singh
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बचपन में अक्सर हम यह सोचते हैं कि बादल रूई की तरह हल्के होते होंगे—इतने हल्के कि उन पर चला भी जा सके। लेकिन विज्ञान इस कल्पना को पूरी तरह बदल देता है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक संस्था United States Geological Survey (USGS) के अनुसार, एक औसत क्यूमुलस बादल का वजन लगभग दस लाख पाउंड तक हो सकता है। यह वजन माल और यात्रियों से भरे एक विशाल बोइंग 747 विमान से भी अधिक है। सवाल यह है कि यदि बादल इतने भारी हैं, तो वे आकाश में तैरते कैसे रहते हैं?

इस रहस्य की कुंजी है—घनत्व (Density)। किसी वस्तु का तैरना केवल उसके वजन पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि वह जिस माध्यम में है, उसके मुकाबले उसका घनत्व कितना है। बादल दरअसल हवा में तैरती अरबों सूक्ष्म जल-बूंदों और बर्फ के कणों से बने होते हैं। ये कण मिलकर भारी जरूर हो जाते हैं, लेकिन जिस हवा में वे मौजूद होते हैं, उसके मुकाबले उनका औसत घनत्व कम होता है।
 
बादलों के बनने की प्रक्रिया भी इसे समझने में मदद करती है। जब धरती की सतह से गर्म, नम हवा ऊपर उठती है, तो वह फैलती है और ठंडी होने लगती है। ठंडा होने पर उसमें मौजूद जलवाष्प संघनित होकर छोटी-छोटी बूंदों का रूप ले लेती है—यही बादल हैं। यह नम हवा आसपास की शुष्क हवा की तुलना में हल्की होती है, इसलिए ऊपर उठी रहती है। यही कारण है कि बादल आकाश में स्थिर या धीरे-धीरे बहते दिखाई देते हैं।

इसके अलावा, हवा में लगातार चलने वाली ऊर्ध्वाधर धाराएँ (Updrafts) भी बादलों को थामे रखती हैं। ये ऊपर की ओर उठती हवाएँ जल-बूंदों को गिरने नहीं देतीं। जब बूंदें बहुत बड़ी और भारी हो जाती हैं, तब गुरुत्वाकर्षण हावी हो जाता है और वे वर्षा के रूप में धरती पर गिरती हैं। इस तरह, बादल न तो जादू से तैरते हैं और न ही वास्तव में भारहीन होते हैं। वे घनत्व, तापमान, नमी और वायु-गतिकी के संतुलन का सुंदर उदाहरण हैं। विज्ञान हमें सिखाता है कि जो दिखने में हल्का और सरल लगता है, उसके पीछे अक्सर अत्यंत गहरी और रोचक प्रक्रियाएँ काम कर रही होती हैं।