सीपियां : जलीय दुनिया की गुपचुप नायिकाएं
नदी की तलहटी में आधी गड़ी हुई या समुद्र के किनारे चट्टानों से चिपकी हुई सीपों में न तो कोई चमक-दमक होती है, न कोई तेज गति। वे न दिखावटी हैं, न ही हमारी रोजमर्रा की नजरों में आती हैं। फिर भी पूरी जलीय दुनिया बहुत हद तक इन्हीं खामोश जीवों पर टिकी हुई है। अगर सीपों को एक पंक्ति में समझना हो, तो कहा जा सकता है कि वे पानी की सफाईकर्मी हैं और ऐसे सफाईकर्मी, जो बिना थके, बिना रुके अपना काम करते रहते हैं।– कुमार सिद्धार्थ
एक सीप प्रतिदिन 20-40 लीटर छान सकती है पानी
सीप अपने शरीर में लगातार पानी खींचती हैं। इस पानी में मौजूद गंदगी, सूक्ष्म कण, बैक्टीरिया, शैवाल, रसायन और यहां तक कि भारी धातुओं को भी वे छान लेती हैं और अपेक्षाकृत साफ पानी वापस पर्यावरण में छोड़ देती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, सामान्य आकार की एक सीप प्रतिदिन 20 से 40 लीटर तक पानी छान सकती है। अब कल्पना कीजिए, यदि किसी नदी, झील या समुद्री तट पर हज़ारों या लाखों सीपें हों, तो वे कितनी विशाल मात्रा में पानी को स्वाभाविक रूप से साफ रखती होंगी। दुनियाभर में सीपों की 1200 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से लगभग 1000 प्रजातियां मीठे पानी में और शेष समुद्री जल में निवास करती हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि मीठे पानी की सीपों की सबसे अधिक विविधता उत्तरी अमेरिका में मिलती है, जहां अकेले लगभग 300 प्रजातियां मौजूद हैं। यूरोप में करीब 16 प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं, जबकि एशिया में भी मीठे पानी और समुद्री, दोनों तरह की सीपों की संख्या काफी अधिक है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सीपों की जैव विविधता और खेती दोनों के लिए जाने जाते हैं।
सीपों का जीवन चक्र और मोती बनने की प्रक्रिया
सीपों की बनावट देखने में सरल, लेकिन कार्य में अत्यंत प्रभावशाली होती है। दो मजबूत खोलों के भीतर उनका कोमल शरीर सुरक्षित रहता है। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं, जिसे सीपें पानी से धीरे-धीरे लेकर परत-दर-परत जमा करती रहती हैं। यही कारण है कि उनका खोल जीवनभर बढ़ता रहता है। मोती बनने की प्रक्रिया भी इसी से जुड़ी है। जब कोई बाहरी कण सीप के शरीर के भीतर फंस जाता है, तो वह उसे ढंकने के लिए कैल्शियम की परतें चढ़ाती जाती है और समय के साथ वही कण मोती का रूप ले लेता है। सीपों का जीवन चक्र भी कम रोचक नहीं है। समुद्री सीपें अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ती हैं, जिनसे सूक्ष्म लार्वा बनते हैं। ये लार्वा कुछ समय तक समुद्र में स्वतंत्र रूप से तैरते रहते हैं और फिर किसी ठोस सतह चट्टान, खोल या तट से चिपककर स्थायी जीवन शुरू करते हैं। मीठे पानी की कई सीपें इससे भी अनोखा तरीका अपनाती हैं। उनके लार्वा कुछ समय तक मछलियों के गलफड़ों या पंखों से चिपककर रहते हैं। इससे उन्हें सुरक्षित वातावरण मिलता है और वे दूर-दूर तक फैल पाती हैं। बाद में वे नदी की तलहटी में गिरकर स्वतंत्र जीवन शुरू करती हैं। यानी सीपें केवल पानी पर नहीं, बल्कि मछलियों पर भी निर्भर करती हैं। यदि मछलियां कम हों, तो सीपों का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है। सीपों की एक और विशेषता उनकी लंबी उम्र है। समुद्री सीपें आमतौर पर 10 से 20 वर्ष तक जीवित रहती हैं, जबकि मीठे पानी की कई प्रजातियां 50 से 100 वर्ष तक भी जी सकती हैं।
सीपों के लिए चुनौती बनता समुद्र का अम्लीयकरण
पिछले कुछ दशकों में स्थिति चिंताजनक होती गई है। मीठे पानी की लगभग एक हज़ार प्रजातियों में से अधिकांश या तो संकटग्रस्त हैं या तेज़ी से घट रही हैं। पोलैंड, क्रोएशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में बड़े पैमाने पर सीपों की मृत्यु दर्ज की गई है। लंदन की टेम्स नदी में पिछले 60 वर्षों में मीठे पानी की लगभग सारी सीपें समाप्त हो चुकी हैं। उत्तरी अमेरिका में 70 प्रतिशत से अधिक मीठे पानी की सीप प्रजातियां संकटग्रस्त या विलुप्ति की कगार पर हैं। इन संकटों के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। पानी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, ग्रीष्म लहरें तीव्र हो रही हैं। जब नदी या समुद्र का पानी अचानक बहुत गर्म हो जाता है, तो सीपें उसे सहन नहीं कर पातीं और बड़े पैमाने पर मर जाती हैं। इसके साथ ही रासायनिक प्रदूषण, माइक्रोप्लास्टिक, नदियों का प्राकृतिक बहाव बदलना, बांध, खनन और शहरी सीवेज इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। महासागरों में समुद्र का अम्लीकरण भी बड़ी चुनौती बन चुका है। कार्बन डाइऑक्साइड के घुलने से पानी अम्लीय हो रहा है, जिससे सीपों के खोल बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। शिशु सीपें तो कई बार खोल बना ही नहीं पातीं।
रोजगार का माध्यम सीपों की खेती
एशिया में सीपों की खेती समुद्र और इंसान के पुराने रिश्ते का विस्तार है। चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में सीपों को ‘उगाया’ नहीं जाता, बल्कि उन्हें ऐसा वातावरण दिया जाता है, जहां वे स्वाभाविक रूप से पनप सकें। समुद्र के किनारे बांस, रस्सियों और टाइलों पर लार्वा चिपक जाते हैं और फिर समुद्र अपना काम करता है। चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। दुनिया में उत्पादित समुद्री सीपों का बड़ा हिस्सा वहीं से आता है। यह खेती लाखों लोगों को रोज़गार देती है—मछुआरों से लेकर रेस्तरां और निर्यात तक। सीपों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है। उनके खोलों से चूना, खाद और निर्माण सामग्री बनती है। भोजन के रूप में वे प्रोटीन, ज़िंक, आयरन और ओमेगा-3 से भरपूर होती हैं। अगर सीपें कम होती गईं, तो पानी की गुणवत्ता गिरेगी, शैवाल विस्फोट बढ़ेंगे, मछलियां मरेंगी और तटीय समुदायों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी।
समुद्र के खामोश सफाईकर्मी
समुद्री सीपें तटीय इलाकों के लिए जीवन-रेखा जैसी हैं। वे पानी साफ रखती हैं, तटों को कटाव से बचाती हैं, छोटी मछलियों और केकड़ों को आश्रय देती हैं और मत्स्य उत्पादन को स्थिर बनाए रखती हैं। जहां सीपों की चट्टानें होती हैं, वहां जैव विविधता कई गुना बढ़ जाती है। एशियाई देशों विशेषकर अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप में सीपों की गिरावट का असर प्रवाल भित्तियों और मछली जीवन पर साफ दिखने लगा है। बढ़ता तापमान, पर्यटन से फैला कचरा, प्लास्टिक और तटीय विकास इन नाजुक तंत्रों को कमजोर कर रहे हैं। फिर भी उम्मीद बाकी है। वॉशिंगटन डीसी की एनाकोस्टिया नदी में सीपों की मदद से पानी साफ किया जा रहा है। यह दिखाता है कि अगर हम पानी को साफ करें, तो सीपें लौट सकती हैं। सीपों में अनुकूलन की अद्भुत क्षमता होती है। हर सामूहिक मृत्यु के बाद कुछ सीपें बचती हैं और वही नई पीढ़ी की नींव बनती हैं। यही उम्मीद है। इन खामोश सफाईकर्मियों को बचाना, दरअसल अपने जल, अपने पर्यावरण और अपने भविष्य को बचाना है।
