बैगपाइप : पहाड़ों की सांसों में बसा सुर

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Published By Anjali Singh
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आप पहाड़ की शांत सुरम्य वादियों में हों और दूर कहीं कोई छोटा सा गांव बसा हो। अचानक वहां से सुरीली सी स्वर लहरियां आकर हवा में बिखरने लगें तो सोचिए कितना सुंदर अनुभव होगा। ऐसा ही अनुभव होता है बैग पाइप को सुनकर यानी हमारी भाषा में मशक बीन या जिसे बीन बाजा भी कहते हैं। मशक बीन जैसे ही अपने स्वर बिखेरती है, तो पहाड़ जीवंत होने लगते हैं, पत्ता-पत्ता मुस्कराने लगता है और फूलों में निखार आ जाता है। अंग्रेज भारत आए और अपने साथ ग्रेट ब्रिटेन के उत्तरी भाग में स्थित स्कॉटलैंड का वाद्य यंत्र बैग पाइप भी साथ लाए। फिर ब्रिटिश आर्मी के बैंड में इसे इस्तेमाल किया गया। आर्मी में शामिल भारतीय सैनिकों को भी इसे सीखने का अवसर मिला। - अमृता पांडे

आप पहाड़ की शांत सुरम्य वादियों में हों और दूर कहीं कोई छोटा सा गांव बसा हो। अचानक वहां से सुरीली सी स्वर लहरियां आकर हवा में बिखरने लगें, तो सोचिए कितना सुंदर अनुभव होगा। ऐसा ही अनुभव होता है बैगपाइप को सुनकर यानी हमारी भाषा में मशक बीन या जिसे बीन बाजा भी कहते हैं।

मशक बीन जैसे ही अपने स्वर बिखेरती है, तो पहाड़ जीवंत होने लगते हैं, पत्ता-पत्ता मुस्कराने लगता है और फूलों में निखार आ जाता है। अंग्रेज भारत आए और अपने साथ ग्रेट ब्रिटेन के उत्तरी भाग में स्थित स्कॉटलैंड का वाद्य यंत्र बैगपाइप भी साथ लाए। फिर ब्रिटिश आर्मी के बैंड में इसे इस्तेमाल किया गया। आर्मी में शामिल भारतीय सैनिकों को भी इसे सीखने का अवसर मिला।¬

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी भारतीय सैनिकों ने इसका खूब अभ्यास किया। यह बैगपाइप भारत का खासकर कुमाऊं और गढ़वाल का होकर रह गया, शायद इसलिए कि स्कॉटलैंड की आबोहवा और प्रकृति उत्तराखंड के सुरम्य वातावरण से काफी हद तक मेल खाती है।

संगीत यूं भी भौगोलिक सीमाओं और सात समंदर की दूरियों को नहीं जानता। हमारे लोक संगीत के साथ इसका अटूट नाता बन गया। मशक बीन का साथ मिला, तो लोकगीतों की ध्वनि मशक बीन के माध्यम से निकालने लगी। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि इसने यहां के कई परंपरागत वाद्य यंत्रों को पीछे छोड़ दिया। इसे मशक बीन का नाम दिया गया। 

मशक यानी पानी की थैली। बचपन में मैदानी क्षेत्रों में भिश्ती को मशक लेकर नालियों को साफ करते देखा था। इस यंत्र की थैली भी बिल्कुल वैसी ही होती हैं। भिश्ती शब्द फारसी शब्द से लिया गया है। पुराने समय में मशक में पानी लेकर युद्ध क्षेत्र में सैनिकों को पानी पिलाकर सेवा करना भिश्ती का ही काम होता था। पांच पाइपों वाला यह एक वायु वाद्य है, जिसे बांसुरी या शहनाई जैसे अन्य वाद्य यंत्रों की तरह ही फूंक मारकर बजाया जाता है। इटली, फ्रांस, इंग्लैंड से होता हुआ यह एशिया की सैर करने आ पहुंचा। 

कई पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल में भी लोकप्रिय हो गया और पाकिस्तान के सियालकोट और भारत के जालंधर शहर में बनाया जाने लगा। बैगपाइप यानी मशक बीन में चमड़े की थैली में चार छेद होते हैं, जिनमें से एक पाइप नीचे की तरफ और तीन ऊपर की तरफ लगे होते हैं। एक पाइप बैग से जुड़ा रहता है, जिसमें वादक फूंक मारता है और दूसरे पाइप को अपनी उंगलियों से नियंत्रित करता है और ऊपर की तरफ निकलने वाले तीन पाइप जो कंधे पर टिकाए गए होते हैं, उनके माध्यम से सुरीले स्वर निकलते हैं। 

बैगपाइप का जिक्र आने पर सबसे पहले स्कॉटलैंड का ग्रेट हाइलैंड बैगपाइप का ही ध्यान आता है, क्योंकि 15 वीं शताब्दी से ही यह वहां के कबीले की संस्कृति में शामिल था। इसकी शुरुआत अक्सर ग्रामीण जीवन के साथ जोड़कर देखी जाती है। ऊब और थकान से बचने के लिए चरवाहे जानवर चराते समय इसे बजाकर मनोरंजन किया करते थे। इसे बनाने के लिए मरे हुए जानवरों का चमड़ा और बांस भी उन्हें जंगल और चारागाह में आसानी से उपलब्ध हो जाता होगा। समय के साथ-साथ इसे मशाल इंस्ट्रूमेंट के तौर पर विकसित किया गया। 

आज के समय में दुनियाभर में लकड़ी और ब्रास से बनाए गए सौ से ज्यादा तरह के बैगपाइप प्रचलन में हैं। पारंपरिक रूप में यह बकरी या भेड़ की खाल को सुखाकर बनाया जाता है और इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले पाइप, जिन्हें चेंटर भी कहते हैं, बांसुरी की ही तरह बांस के होते हैं। 1947 में अंग्रेज चले गए पर मशक बीन भारतीय सैनिकों के दिलों दिमाग में रच बस गया। धीरे-धीरे न जाने कैसे यह हमारे संस्कृतिक समारोहों और वैवाहिक उत्सवों में शरीक हो गया। यह भारतीय सेना का भी अनिवार्य हिस्सा बन गया। 

कुमाऊं रेजीमेंट के अभ्यास और कार्यक्रम के दौरान मशक बीन के सुरीले स्वर वातावरण में मिठास खोल देते हैं। चाहे रानीखेत का सोमनाथ ग्राउंड हो या अल्मोड़ा का कैंट एरिया। पूर्व सैनिक तो इस पर स्कॉटिश धुन बजाने में भी माहिर हैं। गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर राजपथ में होने वाले आयोजन में, जिसमें देसी-विदेशी मेहमानों की उपस्थिति में विशेष परिधान में सजी-धजी सेना की टुकड़ियां इस वाद्य यंत्र के साथ धुन निकालते हुए कदमताल करती हैं। यह धुन इतनी असरकारी है कि पूरा वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज जाता है। इसी तरह सार्वजनिक उत्सवों में अगर ढोल-दमाऊ के साथ मशक बीन की संगत न हो, तो रंगत फीकी सी लगती है। बेडू पाको बारो मासा और कैलै बाजे मुरूली जैसे गीत और मशक बीन एक दूसरे के पर्याय हैं। इन गीतों की धुन मशक बीन पर सुनते ही पैर खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। 

कुमाऊं के छोलिया नृत्य और गढ़वाल के पौणा नृत्य के दौरान मशक बीन की उपस्थिति पैरों की थिरकन और हृदय की धड़कन दोनों को बढ़ा देती है। लोक गीतों के अलावा देश भक्ति गीत, मार्शल म्यूजिक, पश्चिमी धुन, जैज, रॉक, क्लासिकल, फिल्मी गीत सभी बैगपाइप के मदद से बड़ी शान से बजाते हैं। कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में भी इसका जलवा है। इसे बजाना बहुत मेहनत और लगन का काम है। चूंकि यह पाइप में मुंह से हवा भर के बजाया जाता है, तो फेफड़ों की बढ़िया एक्सरसाइज हो जाती है। इसमें धुन तभी निकलती है, जब बैग में हवा भरी हो।