संपादकीय: पाठ्यपुस्तक और प्रतिष्ठा
यदि किसी संवैधानिक संस्था- विशेषकर न्यायपालिका को त्रुटिपूर्ण या भ्रामक तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जाए, तो उसका प्रभाव केवल अकादमिक नहीं, संस्थागत विश्वसनीयता पर भी पड़ता है। कैशोर्य में स्थापित धारणा दीर्घकालिक होती है। अतः कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ संबंधी संदर्भों पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और असाधारण कड़ा रुख पूरी तरह सही है, हालांकि इस कठोर प्रतिक्रिया को देख कर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि एनसीईआरटी द्वारा अतीत में इतिहास, राजनीति, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में हुए विवादित बदलावों पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान ले कर ऐसी त्वरित कारगुजारी क्यों नहीं की? संभवतः न्यायालय सामान्यतः नीतिगत-शैक्षिक सामग्री में हस्तक्षेप से बचता है पर संविधान-विरोध या गंभीर विधिक उल्लंघन के मामले में अधिक सक्रिय रहता है।
न्यायालय द्वारा आपत्तिजनक सामग्री पर रोक, पुनर्मुद्रण रोकना और डिजिटल प्रसार पर प्रतिबंध तकनीकी युग में पूर्णतः लागू करना कठिन अवश्य है, पर यह स्पष्ट संदेश देता है कि संस्थागत प्रतिष्ठा से समझौता नहीं होगा, हालांकि दीर्घकालिक समाधान सेंसरशिप नहीं, बल्कि गुणवत्ता-नियंत्रण और संतुलित अकादमिक विमर्श है। जाहिर है पुस्तक के उक्त अध्याय में न्यायपालिका के मात्र दोषों का उल्लेख हो और राजनीति व व्यवस्थापिका की समांतर चर्चा न हो, तो यह संतुलनहीनता है। यदि देश में भष्टाचार चहुंओर है, तो लोकतंत्र की तीनों शाखाओं में उसकी व्याप्ति को समग्रता में पढ़ाया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की ऐतिहासिक उपलब्धियों मौलिक अधिकारों की रक्षा, जनहित याचिकाएं, आपातकालीन दुरुपयोग पर अंकुश का उल्लेख न होना, अधूरा चित्र प्रस्तुत करता है। एनसीईआरटी का यह कहना कि त्रुटि ‘अनजाने’ में हुई, सहज स्वीकार्य नहीं। पाठ्यपुस्तक निर्माण बहु-स्तरीय प्रक्रिया है। लेखन, समीक्षा, संपादन, विशेषज्ञ समिति और उच्चस्तरीय स्वीकृति। यदि इन सबके बाद भी तथ्यात्मक या संदर्भगत भूल रह गई, तो जानबूझकर की गई क्यों न मानी जाए। सार्वजनिक खेद स्वागतयोग्य है पर इसकी आड़ ले, दायित्व से बचने की बजाए पारदर्शी जांच, जिम्मेदारी तय करने और सुधारात्मक उपाय लागू होने चाहिए। दोष केवल एनसीईआरटी तक सीमित नहीं हो सकता।
शिक्षा मंत्रालय और व्यापक नीतिगत ढांचा भी इसके लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं। पाठ्यक्रम परिवर्तन अक्सर राजनीतिक-सामाजिक विमर्श से प्रभावित होते हैं, ऐसे में पारदर्शिता और बहु-विचारधारात्मक समीक्षा अत्यंत अनिवार्य है। यदि यह सिद्ध हो कि प्रकाशन न्यायपालिका को कलंकित करने के उद्देश्य से जानबूझकर किया गया, तो यह गंभीर कदाचार है। तथ्यों का विकृतिकरण, शिकायतों की संख्या को संदर्भ-विहीन प्रस्तुत करना या पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की टिप्पणियों को गलत अर्थ में उद्धृत करना, ये सब संस्थागत अवमानना की सीमा तक जा सकते हैं और भारी सज़ा की वजह बन सकते हैं, पर आपराधिक अवमानना तब बनती है जब न्याय के प्रशासन में बाधा उत्पन्न हो या न्यायालय की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का उद्देश्य स्पष्ट हो, किंतु इसके लिए दुर्भावना और आशय का प्रमाण आवश्यक है।
