मरीजों को रोशनी दे रहा ‘सीतापुर आई हास्पिटल’
दो दशक पहले तक उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की जनता के लिए आंखों के इलाज का पहला नाम था- ‘सीतापुर आई हॉस्पिटल’। आज भले ही यह चिकित्सालय सुर्खियों से दूर हो गया हो, पर गुमनामी में भी अपनी मूल प्रतिबद्धता सेवा और उपचार को पूरी निष्ठा से निभा रहा है। 32 शाखाओं वाले इस एशिया के प्रसिद्ध संस्थान का पांच अस्पतालों तक सिमट जाना एक युग का परिवर्तन जरूर है, लेकिन इन दुर्दिनों ने ही यूपी में कॉरपोरेट सेक्टर के नेत्र चिकित्सालयों की नींव भी तैयार की। वर्तमान ट्रस्ट प्रबंधन का दावा है कि आने वाले वर्षों में यह अस्पताल फिर अपनी वही विश्वस्तरीय पहचान हासिल करेगा। -पद्माकर पाण्डेय एवं फोटो ग्राफर शुभांकर चक्रवर्ती
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इतिहास
राजधानी से करीब 80 किमी दूर सीतापुर में वर्ष 1926 में फूस की झोपड़ी से शुरू हुई यह सेवा-यात्रा संस्थापक पद्मश्री एवं पद्मभूषण डॉ. महेश प्रसाद मेहरे की दूरदर्शिता का परिणाम है।
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आर्थिक लाभ की चाह से दूर, उन्होंने 1945 में महारानी एलिज़ाबेथ से प्राप्त दान से 11.22 एकड़ भूमि पर अस्पताल की औपचारिक नींव रखी। इसके बाद उन्होंने दूरदराज के गरीब मरीजों तक इलाज पहुंचाने के लिए प्रदेश में 32 शाखा अस्पताल खोले।
नेशनल-एशियन पहचान
500 बेड वाले मुख्य अस्पताल में रोजाना सैकड़ों नेत्र सर्जरी होती थीं। मोतियाबिंद, कार्निया प्रत्यारोपण, ग्लूकोमा, रेटिना सर्जरी, सबका उपचार यहां सहज और सुलभ था। इसी कारण एशिया में इसका बड़ा नाम हुआ। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तक इस संस्थान का भ्रमण कर चुके हैं।
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नेत्र शिक्षा का बड़ा केंद्र
1964 में स्थापित इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी ने इस संस्थान को नेत्र विशेषज्ञों की पाठशाला बना दिया। इसका शिलान्यास तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन और उद्घाटन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। वर्ष 1981 में भारत सरकार ने इसे रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी का दर्जा दिया। साल 1974 में संस्थापक की मृत्युपरांत उनके पुत्र और ट्रस्ट सचिव डॉ. मिथलेश कुमार(एमके) मेहरे ने 2011 तक कमान संभाली। इस दौरान इस अस्पताल और ट्रस्ट को हथियाने के षड्यंत्र भी रचे गए। वर्ष 1994 में राजनैतिक हस्तक्षेप से संस्थान में वरिष्ठ चिकित्सकों की हड़ताल भी हुई, ट्रस्ट के समक्ष मुश्किलें इस कदर खड़ी कर दी गई थी कि संस्थान की सुरक्षा के लिए तत्कालीन ट्रस्ट प्रशासन को बाहुबलियों का सहयोग लेना पड़ा, जिसमें आर्थिक व्यय अत्यधिक था। हालांकि आर्थिक चुनौतियां आदि इस संस्थान के पतन के कारण बने। वर्ष 2002 में कार्यकारी प्रशासनिक अधिकारी डॉ. ए. के. पॉल के निधन और बाद में व्यवस्थागत कमजोरियों के बीच अस्पताल लगातार लड़खड़ाता गया। हालांकि वर्ष 2009-10 में ट्रस्ट ने जिम्मेदारी कर्नल डॉ. मधु भदौरिया और प्रशासनिक प्रबंधन आर. एस. भदौरिया को सौंपी, जिसके बाद पुनरोद्धार की प्रक्रिया शुरू हुई।
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मिल रहा है गंभीर बीमारियों का अत्याधुनिक इलाज
संस्थापक डॉ. मेहरे द्वारा 1949 में बनाए गए ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित सीतापुर नेत्र चिकित्सालय में वर्तमान नामित ट्रस्टी (कर्नल) डॉ. मधु भदौरिया का कहना है कि वर्तमान में सीतापुर अस्पताल समेत प्रदेश में पांच अस्पताल संचालित हो रहे हैं, प्रयागराज स्थित अस्पताल वर्तमान में राज्य सरकार से लौटकर पुन: ट्रस्ट के पास वापस आ चुका है, जिसे मरीजों के लिए उपयोगी बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 2008-09 में जो अस्पताल बंद हो गया था, उस अस्पताल में एक साल में 50 हजार से ज्यादा सर्जरी हो रही हैं, जो कि साल दर साल आकंड़ा बढ़ता जा रहा है। उन्होंने बताया कि राजधानी लखनऊ समेत अन्य शाखा अस्पतालो में डे केयर की सुविधा के साथ नेत्र संबंधी समस्त चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध हैं। राजधानी में हजरतगंज स्थित चौपड़ हास्पिटल परिसर में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बीमारियों में बताया कि मोतियाबिंद के ऑपरेशन के साथ ही, रेटिना ट्रांसप्लांट, पीडियाट्रिक ऑप्थलमोलॉजी, आई बैंक, कार्निया प्रत्यारोपण और ग्लूकोमा तक का अत्याधुनिक इलाज उपलब्ध है।
अस्पताल का स्वर्णिम काल और दुर्दिन
2009 में बतौर चीफ मेडिकल ऑफिसर नियुक्त होने वाली कर्नल डॉ. मधु भदौरिया का कहना है कि जब उन्हें की जिम्मेदारी दी गई थी, प्रशासनिक अधिकारी उनके पति आर एस भदौरिया को नियुक्त किया गया था। उस दौरान अस्पताल समेत पूरा ट्रस्ट तमाम झंझावतों से जूझ रहा था, अस्पतालों में व्यवस्थाएं चरमरा चुकी थी। नए संसाधन जुटे नहीं, पुराने संसाधन निष्क्रिय होने लगे, आर्थिक बोझ बढ़ता गया। यही वजह है कि सीतापुर में तमिलनाडु के मदुरै के अरविंद आई केयर सिस्टम के साथ मिलकर नेत्र चिकित्सा क्षेत्र में काम करने का एमओयू भी किया गया था।
अत्याधुनिक इलाज बहुत सस्ते में
कॉर्पोरेट सेक्टर के नेत्र चिकित्सालयों में महंगे इलाज के सापेक्ष सीतापुर आई हॉस्पिटल में अत्यंत कम शुल्क में अत्याधुनिक इलाज उपलब्ध है। इस संबंध में केजीएमयू की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं सीतापुर आई हॉस्पिटल के शिक्षण कार्य प्रभारी डॉ.विनीता सिंह का कहना है कि अस्पताल सभी अत्याधुनिक चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध हैं, जो कार्पोरेट सेंक्टर के अस्पतालों में महंगे दामों में उपलब्ध हैं। यहां पर मात्र 150 रुपए के शुल्क पर मरीज के आंखों की जांच के साथ परामर्श मिलता है। अतिरिक्त इलाज कार्पोरेट सेक्टर के शुल्क से करीब 50 फीसदी कम होता है, इसके अलावा दवाएं भी किफायती दरों पर उपलब्ध हैं।
नेत्र शिक्षा का मजबूत ढांचा
* एमएस ऑप्थल्मोलॉजी- 15 सीटें (हर साल नीट के जरिए)
* कुल 45 पीजी रेजीडेंट प्रशिक्षण ले रहे
* बैचलर ऑफ ऑप्टोमेट्री (बीआप्ट) - 40 सीटें
* डिप्लोमा इन ऑप्थल्मिक असिस्टेंट - 30 सीटें
* डीओए,एमसीओपी तथा लो विजन प्रशिक्षण कार्यक्रम
* ओटी असिस्टेंस व मिड-लेवल ऑप्थल्मिक तकनीशियन तैयार किए जाते हैं
45 रेजीडेंट्स करते हैं एमएस
सीतापुर आई हॉस्पिटल के कॉलेज में एमएस ऑप्थल्मोलॉजी पीजी की 15 सीटें हैं, जिन पर हर साल नीट काउंसिलिंग के द्वारा दाखिला मिलता है। इस प्रकार तीन साल के करीब 45 पीजी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण के साथ चिकित्सकीय सेवाएं प्रदान करते हैं। इसके अलावा चार वर्षीय बैचलर ऑफ ऑप्टोमेट्री (बीआप्ट) की 40 सीटों पर हर साल दाखिला मिलता है। डिप्लोमा इन ऑप्थल्मिक एसिस्टेंट की 30 सीटे पर हर साल दाखिला मिलता है। इसके आलवा डीओए और एमसीओपी पाठ्यक्रम भी संचालित होते हैं, जिसमें मिड लेवल आप्थैालमिक टेक्नी शियन का प्रशिक्षण दिया जाता है, मरीजों को ओटी में तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। लो विजन ट्रेनिंग प्रोग्राम भी सिखाया जाता है।
लो विजन विभाग : रोशनी खोने वालों को जीवन का सहारा
जब उम्र या बीमारी से आंखों की रोशनी बहुत कम रह जाती है, तो लो विजन विभाग मौजूद विशेष उपकरण, सॉफ्टवेयर, स्मार्टफोन आधारित तकनीक से मरीजों को फिर से चलने–फिरने और दैनिक काम करने योग्य बनाता है।
राजधानी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम
लखनऊ के चौपड़ परिसर स्थित अस्पताल में 5 विशेषज्ञ डॉक्टर और 30 पैरामेडिकल स्टाफ सेवाएं दे रहे हैं। सुबह 9 बजे से पंजीकरण के साथ शुरू होकर दोपहर 3 बजे तक ओपीडी सेवाएं चलती है। रोजाना 100 से 150 मरीज दिखाने आते हैं।
अस्पताल के विशेषज्ञों में
* डॉ. विनीता सिंह – बाल नेत्र रोग
* डॉ. ज्योति भट्ट – ग्लूकोमा/कैट्रेक्ट
* डॉ. अश्वनी सिंह – कार्निया और रेफ्रेक्टिव
* डॉ. शरीन मिश्रा पाण्डेय – रेटिना
* डॉ. गुरसिमरन कौर – एंटिरियर सेगमेंट
उपलब्ध सेवाएं -
1. मोतियाबिंद सर्जरी
2. ग्लूकोमा उपचार
3. रेटिना सर्जरी
4. कॉर्निया सर्जरी
5. बाल नेत्र रोग
6. न्यूरो-ऑफ्थल्मोलॉजी
7. ओकुलोप्लास्टी
8. नेत्र पुनर्वास सेवाएं
