अनुभूति: जन्मदिन, जीवन के सफर का उत्सव
बचपन में जन्मदिन किसी त्योहार से कम नहीं होता था। सुबह से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी। मां रसोई में कुछ खास बनाती थीं, पिताजी मुस्कुराते हुए आशीर्वाद देते थे, रिश्तेदार फोन करते थे या घर आकर गले लगाते थे। एक छोटा-सा केक, कुछ मोमबत्तियां और ढेर सारा स्नेह, बस इतना ही तो चाहिए था खुश होने के लिए। उस समय जन्मदिन केवल तारीख नहीं, बल्कि अपने होने का उत्सव था। फिर समय बदला। बड़े हुए तो जन्मदिन का अर्थ बदल गया। दोस्तों के साथ पार्टी, हंसी-मजाक, देर रात तक जश्न यह सब जन्मदिन की पहचान बन गया। परिवार की जगह दोस्तों का दायरा बढ़ गया। खुशी वही थी, पर रूप अलग था। उस उम्र में लगता था कि यही असली जीवन है।
फिर विवाह हुआ। अब लोग सालगिरह याद रखने लगे और जन्मदिन धीरे-धीरे परिवार तक सीमित हो गया। जिम्मेदारियां बढ़ीं, प्राथमिकताएं बदलीं। जीवन की दौड़ में तारीखें कैलेंडर के पन्नों में सिमटने लगीं। जन्मदिन अब उतना शोर-शराबे वाला नहीं रहा, बल्कि एक शांत-सा दिन बन गया, जिसमें कुछ संदेश, कुछ औपचारिक शुभकामनाएं और सामान्य दिनचर्या शामिल हो गई। धीरे-धीरे अपने बच्चे हुए। अब घर में फिर से जन्मदिन मनाया जाने लगा, पर इस बार अपने बच्चों का। उनके लिए केक, सजावट, उपहार और उत्साह। उनकी आंखों की चमक में हम अपना बचपन तलाशने लगे, लेकिन इसी बीच कहीं हमारा अपना जन्मदिन पीछे छूट गया। कभी-कभी तो चुपचाप गुजर भी जाता है। तब मन में एक विचार उठता है, जब हमारे माता-पिता हमारा जन्मदिन इतने प्रेम से मनाते थे, क्या उस समय उनका अपना जन्मदिन भुला दिया गया था?
शायद यही दुनिया की रीति है। समय के साथ केंद्र बदलता रहता है। बचपन में हम केंद्र में होते हैं, युवावस्था में मित्र, फिर परिवार और अंत में बच्चे। जीवन का चक्र ऐसे ही चलता है। एक पीढ़ी उत्सव मनाती है, दूसरी पीढ़ी उत्सव का कारण बनती है, लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि जन्मदिन की कोई कीमत नहीं रही? नहीं। जन्मदिन केवल केक या पार्टी का नाम नहीं है। यह उस जीवन का उत्सव है, जो हम जी रहे हैं, उन संघर्षों का सम्मान है, जिन्हें हमने पार किया है और उन सपनों का स्मरण है, जो अब भी हमारे भीतर जीवित हैं। आज के बदलते समाज में एक अच्छी बात भी दिखती है कि कई बच्चे अपने माता-पिता का जन्मदिन मनाने लगे हैं। वे उन्हें दो पल की खुशी देते हैं, उनके बचपन और युवावस्था को याद करने का अवसर देते हैं। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।-प्रिंस श्रेयश, शिक्षक
