क्यों लगता है मृत्यु से डर
मृत्यु जीवन का विश्राम स्थली हैं, जहां जीवात्मा अपनी थकान दूर करती, नये जीवन के लिए शक्ति प्रदान करती है। थकान दूर करने के लिए विश्राम तो नित्य ही करते हैं। पुनः नई शक्ति एवं स्फूर्ति से दैनिक कार्यों में जुड़ जाते हैं। विश्रामावधि में जाने में ना तो डर लगता है, ना ही किसी प्रकार की कठिनाई अनुभव होती है। विश्राम के अभाव में तो व्यय हुई शक्ति की आपूर्ति नहीं हो पाती।
काया कमजोरी तथा श्रम के अयोग्य हो जाती है। जीवन भर की थकान को मिटाने के लिए भावी जीवन के लिए शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से मृत्यु रूपी विश्राम अवधि भी उतनी ही आवश्यक है। काया-परिवर्तन इसलिए आवश्यक हो जाता है कि लंबी अवधि तक श्रम करने के कारण वह इस योग्य नहीं रहती कि कठोर श्रम कर सके। पुराने फटे वस्त्रों को बदलकर, नये पहन लिए जाते हैं। जर्जर हो गई मशीनों को पूर्ण रूपेण परिवर्तित कर देना ही उचित होता है।
इन परिवर्तनों में ना तो किसी प्रकार का दुराग्रह होता है, ना आसक्ति और नहीं किसी प्रकार का भय। नये के प्रति, परिवर्तन के प्रति भयभीत हो जाने अथवा पुरातन के प्रति आसक्ति बने रहने से उन लाभों से वंचित रह जाना पड़ता है, जो नए वस्त्रों एवं वस्तुओं से मिलता है। मृत्यु के संबंध में यही बात लागू होती है।
मृत्यु इसलिए भी आवश्यक एवं उपयोगी है कि जीव नये जीवन का, परिवर्तन का आनंद ले सके। मृत्यु का क्रम रुक जाय, उस स्थिति की कल्पना की जाय तो पता चलता है कि जीवन कितना नीरस एवं उभरा होगा। लंबी आयु, अमर काया, जर्जर, अशक्त बनी लाश ढोने के समान होगी, बुढ़ापा वैसे ही कितना नीरस भार भरा प्रतीत होता है। उस पर भी यदि उसके साथ अमरता का वरदान जुड़ जाए तो कितनी कठिनाई होगी।
निश्चित ही कोई विचारशील, काया रूपी अमरता को स्वीकार न करना चाहेंगे। असमर्थ, अशक्त, जराजीर्ण काया की गठरी के बोझ को कौन सदा ढ़ोना चाहेगा? फिर मृत्यु से डर क्यों लगता है? शरीर के प्रति आसक्ति क्यों बनी रहती है? इन कारणों पर विचार करने पर पता चलता है, कि मृत्यु एवं जीवन के स्वरूप की वास्तविक जानकारी न होने के कारण ही भय लगता है।
हमारी सत्ता शरीर से अलग है-शाश्वत, अविनाशी एवं अमर है। यह बोध बना रहे तो मृत्यु की आशंका से भयभीत होने का कोई कारण नहीं दिख पड़ता। शरीर सत्ता को ही सब कुछ मान लेने, मृत्यु के साथ जीवन का अंत समझ लेने से डर लगता है। शास्त्र इसलिए निर्देश देते हैं कि अपनी सत्ता को जानो और पहचानो, शास्त्रों का प्रत्येक को अध्ययन करना चाहिए। -शिवानंद मिश्रा
