Ramadan 2026: रोजा रखने से अगर किसी की जान का खतरा हो तो उसे रोजे से छूट है? शिया-सुन्नी हेल्पलाइन पर रोजेदारों ने पूछे सवाल
लखनऊ, अमृत विचार: रोजेदारों की सुविधा के लिए पहली रमजान को शिया और सुन्नी हेल्पलाइन शुरू की गई। इस्लामिक सेंटर ऑफ़ इंडिया के तहत दारुल उलूम निजामिया फिरंगी महल की ओर से संचालित हेल्पलाइन पर मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली के मार्गदर्शन में धर्मगुरुओं के एक पैनल ने सवालों के जवाब दिए।
इस्लामिक सेंटर की हेल्पलाइन पर एक रोजेदार ने पूछा कि रोजे की हालत में अगर किसी के मुंह से खून आ जाए तो रोजे पर क्या असर पड़ेगा ? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि खून अगर हलक के अंदर नहीं जाता है तो रोजे पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। एक रोजेदार ने पूछा कि वह कौन सी बातें हैं जिनसे रोजा मकरूह हो जाता है ? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि बगैर जरूरत किसी चीज को चबाना, कोयले से दांत मांझना और गाने-बजाने में लगे रहने से रोजा मकरूह हो जाता है।
कार्यालय आयतुल्लाह अल उज़मा सैयद सादिक़ हुसैनी शीराजी की ओर से जारी शिया हेल्प लाइन पर सवालों के जवाब मौलाना सैयद सैफ अब्बास नक़वी ने दिए।शिया हेल्पलाइन पर पूछा गया कि अगर कोई व्यक्ति रोजा रखकर सोशल मीडिया पर रील आदि देखता है, तो क्या उसका रोजा सही है? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि अगर रोजेदार जान बूझकर कोई गैर-शराई चीज देखेगा, तो रोजा तो नहीं टूटेगा लेकिन वह इंसान रूहानी रोजेदार नहीं बन सकता।
एक रोजेदार ने पूछा कि रोजे की नियत करना जरूरी है, अगर कोई व्यक्ति भूल जाता है तो उसका क्या हुक्म है? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि रोजेदार के लिए रोजे की नियत करना जरूरी है चाहे वह हर दिन की अलग नियत करे या पूरे महीने की एक साथ नियत कर ले। हेल्पलाइन पर पूछा गया कि अगर किसी व्यक्ति को शुगर की बीमारी है और दिन में शुगर कम या ज्यादा होती है, तो ऐसी स्थिति में क्या हुक्म है? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि अगर किसी व्यक्ति को शुगर की वजह से बीमारी बढ़ने या जान का खतरा है, तो वह रोजा नहीं रखेगा।
एक रोजेदार ने पूछा कि अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा यात्रा करता है, तो उसका रोजा किस तरह सही होगा? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि जो व्यक्ति हर महीने 10 या 15 दिन सफर में रहता हो वह सफर की हालत में रोजा रख सकता है। एक सवाल आया कि अगर अजान के वक्त रोजा इफ्तार न किया जाए तो क्या रोजा मकरूह हो जाता है? इस सवाल के जवाब में बताया गया कि अगर कोई रोजेदार नमाज पढ़ने के बाद रोजा इफ्तार करता है, तो रोजा मकरूह नहीं होता, बल्कि इसमें ज्यादा सवाब है।
