भारत के खगोलविद् समझेंगे ब्रह्मांड की गुरुत्व लहरें
कॉम्पैक्ट बाइनरी कोलीसेंस ऑब्जर्व्ड बाय लीगो एंड विर्गोड्यूरिंग द सेकेंड पार्ट ऑफ द थर्ड ऑब्जर्विंग रन शीर्षक से उपलब्ध एक रिसर्च-रिव्यु रिपोर्ट उस व्यापक परियोजना के बारे में बात करती है, जिससे रेडियो एस्ट्रोनॉमर्स ने सुदूर ब्रह्मांड में ग्रेविटेशनल वेव्स की उपस्थिति के स्रोतों को चिह्नित किया है।
ग्रेविटेशनल वेव्स अर्थात गुरुत्व लहरों और इनमें समाई हुई विपुल शक्ति से ब्रह्मांड में नई रचनाओं का जन्म होता है और पुरानी रचनाओं एवं अरबों-खरबों गैलेक्सियों में मौजूद तारों या कहें तो ऑब्जरवेबल स्टार्स के जीवन मरण की घटनाओं के अलावा ब्लैक होल्स की मैपिंग करने के बाद एक कैटेलॉग बनाया गया है।
कैटेलॉग, मतलब एक ऐसी बड़ी सूची वाली किताब, जिसमें यह दर्ज किया गया है कि फलां तारा या ब्लैक होल, पृथ्वी से किए गए अवलोकन की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर, ब्रह्मांड में किस तरफ और कितना दूर मौजूद हैं और क्या होने की संभावना है, जिसे एक विशिष्ट संख्या और नाम दिया गया है।-रणबीर सिंह विज्ञान लेखक
मनुष्य की वैज्ञानिक रुचियों का यह एक ऐसा अध्याय है, जिसकी कोई भी व्याख्या विस्मित करने के लिए काफी है। ब्रह्मांड अवलोकन के लिए जो भी साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स अब तक बनाए गए हैं या प्रतावित हैं, उन पर अनेक देशों ने सम्मिलित रूप से इतनी धनराशि खर्च कर दी है, जोकि हमारे अनुमान से आगे निकल जाती है।
इन 200 सालों में अन्वेषण की उत्तेजना से ओतप्रोत खगोलविदों ने ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को कई गुणा बढ़ाया है। एस्ट्रोफिजिक्स में ऐसे आख्यान सेट किये गए हैं, जोकि प्रथम दृष्टया समझ से बाहर हैं, क्योंकि एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स में नियम और गणनाएं और संबद्ध टर्मिनोलॉजी उपलब्ध हैं, उन्हें इस विधा के जानकारों के अलावा अन्य लोग कम ही समझते हैं।
उपर्युक्त शीर्षक के अंतर्गत 82 पन्नों में दुनिया के जाने-माने और कम ज्ञात उन 297 संस्थानों ने सहयोग करते हुए, जो लंबा-चौड़ा शोध-समीक्षा पत्र प्रकाशित किया है वह एक व्यापक और दीर्घकालिक सहयोग का नतीजा है। ग्रेविटेशनल वेव्स के सोर्सेज की मैपिंग क्यों जरूरी है और क्यों इस पर कभी भी राजनीतिज्ञों की टिप्पणियां आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं? इसलिए कि ऐसे विषयों के बारे में संबद्ध विभाग और मंत्रालय से जुड़े हुए संस्थानों और फंडिंग एजेंसीज की टेक्निकल और साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटियों या एक देश की संसद की स्थायी समिति में चर्चा होती है और इनकी रिपोर्टिंग कम ही होती है।
उपर्युक्त स्टडी में कहा गया है कि इसमें ब्रह्मांड में ग्रेविटेशनल वेव स्रोतों की बहुतायत का खुलासा है, जोकि एडवांस्ड लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्ज़र्वेटरी लीगो और एडवांस्ड विर्गो डिटेक्टरों से किया गया तीसरी बार का कोलैबोरेशन सर्वेक्षण हैं। लीगो-विर्गो द्वारा किए गए सर्वेक्षण की तीसरी पारी के अंत तक खोजे गए ट्रांजिएंट ग्रेविटेशनल वेव सिग्नलों का ही यह रिकॉर्ड है, जोकि तीसरी पारी के दूसरे भाग में दर्ज किए गए सिग्नलों को शामिल करके पिछले सर्वेक्षण का नवीकरण करता है। नवीकरण अध्ययन में 1 नवंबर 2019 से 27 मार्च 2020 तक की अवधि में तीसरी पारी के दौरान का डेटा शामिल है।
ग्रेविटेशनल वेव्स एक एस्ट्रोनॉमिकल टूल है, जिसे इंस्ट्रूमेंट्स डिटेक्टर्स से पकड़ कर ब्रह्मांडीय रचनाओं की स्थिति, इनमें हुए परिवर्तन और व्यवहार पर नजर रखी जाती है और अवलोकन करते हुए डाटा दर्ज किया जाता है। यह भी कि इन व्यवहार परिवर्तनों और ग्रेविटेशनल वेव्स से पृथ्वी और सौर मंडल कैसे प्रभावित होता है।
पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के उपाय इन्हीं अवलोकनों की व्याख्या से मालूम होते हैं, जिसके लिए व्यापक डाटा का सुपर कंप्यूटर से एनालिसिस किया जाता है। इससे हमें मालूम होता रहता है कि सुदूर ब्रह्मांड से आने वाली ग्रेविटेशनल लहरों की शक्ति से पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर पर क्या प्रभाव पड़ा है। अस्तित्व हेतु इसमें आने वाले सूक्ष्म परिवर्तन पृथ्वी के मौसम की विशाल मशीनरी को प्रभावित करते हैं, जिस पर जीवन टिका हुआ है।
लीगो वेधशालाओं की स्थापना
लीगो से पहले ब्रह्मांड के बारे में हमारे पास जो भी, जैसा भी डाटा था वह प्रकाश और इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों को ऑप्टिकल एवं रेडियो टेलेस्कोप्स के प्रयोग से रिकॉर्ड किया जाता था। लीगो ऑब्जर्वेटरीज की स्थापना के बाद से एक अतिरिक्त और बेहतर टूल खगोल भौतिकिविदों को हासिल हुआ है। लीगो वेधशालाओं की स्थापना होने के बाद सन् 2002 में इन्होंनें काम करना शुरू किया था। सन् 2015 में लीगो को उन्नत किया गया तभी बहुत सा नया डाटा मिला। ग्रेविटेशनल वेव्स की मौजूदगी की अवधारणा सबसे पहले अल्बर्ट आइंस्टीन ने स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में प्रकट की थी। क्या ग्रेविटेशनल वेव्स वास्तव में उपस्थित हैं, यह मालूम करने के लिए सन् 1960 में अमेरिकी और सोवियत युग के वैज्ञानिकों ने चिंतन करते हुए इन्हें पकड़ने के लिए सैद्धांतिक कार्य शुरू किया और कहा कि ये मौजूद हैं और इनके दर्ज करना भी संभव है, बशर्ते विशिष्ट प्रकार के इंस्ट्रूमेंट्स का निर्माण कर लिया जाए।
इंटरफेरोमीटर का निर्माण
प्रोटोटाइप इंटरफेरोमेट्रिक ग्रेविटेशनल वेव डिटेक्टर इंटरफेरोमीटर, 1960 के दशक के आखिर में रॉबर्ट एल फॉरवर्ड और ह्यूजेस रिसर्च लेबोरेटरीज में उनके साथियों ने बनाए थे, जिनमें शीशे, फ्री स्विंगिंग के बजाय, वाइब्रेशन आइसोलेटेड प्लेट पर लगे थे। सन् 1970 के दशक में मैसाच्यूसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एमआईटी, कैलिफोर्निया, यूएस में वीस ने, जो इंस्ट्रूमेंट बना उसमें फ्री स्विंगिंग शीशे थे, जिनके बीच लाइट कई बार टकराती थी। बाद में जर्मनी में हेंज बिलिंग और उनके साथियों ने और फिर ग्लासगो, स्कॉटलैंड में रोनाल्ड ड्रेवर, जेम्स हॉफ और उनके साथियों ने भी अपने तरीके से ग्रेविटेशनल वेव्स को दर्ज करने के लिए यंत्र प्रणालियों का निर्माण किया था। काम जारी रहा और सन् 1980 में, यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन ने एमआईटी के पॉल लिंसय, पीटर सॉल्सन, रेनर वीस के नेतृत्व में एक बड़े इंटरफेरोमीटर के निर्माण और अध्ययन करने के लिए फंड दिया। फिर कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कैलटेक के रोनाल्ड ड्रेवर और स्टैन व्हिटकॉम्बने 40 मीटर का एक प्रोटोटाइप बनाया, लेकिन दूसरी ओर एमआईटी ने पर्याप्त सेंसिटिविटी के साथ 1 किलोमीटर स्केल पर इंटरफेरोमीटर बनाने की संभावना साबित की, जिसमें बहुत से डिश-टाइप ऐंटेना जमीन पर लगाकर इन्हें आपस में जोड़ा जाना शामिल था।
रिसर्च और डेवलपमेंट
(एमआईटी) और कैलटेक के वैज्ञानिकों ने जब गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज के महत्व को समझा, तब उन्होंने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए साझेदारी की। ड्रेवर, किप थॉर्न और रोनाल्ड वीस के नेतृत्व में एक स्टीयरिंग कमेटी गठित की गई, जिसने 1986 तक परियोजना की दिशा तय की। बाद में अमेरिकी सरकार ने संरचना में बदलाव करते हुए कैलटेक के रोचस ई. वाउट को निदेशक नियुक्त किया। 1988 में प्रारंभिक चरण पूरा होने के बाद अनुसंधान एवं विकास के विस्तार हेतु नए प्रस्ताव को स्वीकृति मिली, किंतु 1989 से 1994 के बीच परियोजना तकनीकी और संगठनात्मक चुनौतियों से जूझती रही। नियमित फंडिंग के प्रस्ताव बार-बार अस्वीकृत होते रहे। अंततः 1991 में अमेरिकी कांग्रेस ने पहले वर्ष के लिए 23 मिलियन डॉलर की राशि स्वीकृत की। 1992 में परियोजना का पुनर्गठन किया गया और इसे एक उन्नत “इवोल्यूशनरी डिटेक्टर” के रूप में विकसित करने की योजना बनी, जो गुरुत्वाकर्षण तरंगों का सूक्ष्मतम स्तर पर पता लगा सके। 1994 में नेशनल साइंस फाउंडेशन ने 395 मिलियन डॉलर की ऐतिहासिक फंडिंग दी, जो उस समय की सबसे बड़ी वैज्ञानिक सहायता थी। उसी वर्ष वाशिंगटन के हैनफोर्ड और 1995 में लुइसियाना के लिविंगस्टन में निर्माण कार्य शुरू हुआ। 1997 तक निर्माण पूरा होने की दिशा में बढ़ते हुए दो संस्थाएं स्थापित की गईं—लीगो लेबोरेटरी और लीगो साइंटिफिक कोलैबोरेशन—जिनका उद्देश्य तकनीकी और वैज्ञानिक शोध को सुव्यवस्थित करना था।
भारत ने भी लीगो-इंडिया परियोजना के माध्यम से इस वैश्विक प्रयास में भागीदारी की। इसका लक्ष्य अमेरिका और इटली की प्रयोगशालाओं के सहयोग से भारत में एक अत्याधुनिक गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला स्थापित करना है। फरवरी 2016 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिली और महाराष्ट्र में उपयुक्त स्थल का चयन हुआ। अप्रैल 2023 में भारत सरकार ने 2,600 करोड़ रुपये के बजट को स्वीकृति दी। परियोजना के 2030 तक पूर्ण होने की उम्मीद है। लीगो-इंडिया में चार किलोमीटर लंबे दो वैक्यूम चैंबर होंगे, जो अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों से सुसज्जित रहेंगे। यह वेधशाला वैश्विक नेटवर्क का अहम हिस्सा बनेगी और गुरुत्वाकर्षण तरंग खगोल विज्ञान में भारत की भूमिका को सशक्त करेगी। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि गुरुत्व लहरों का अध्ययन ब्रह्मांड में पदार्थ की उत्पत्ति और विकास संबंधी हमारी समझ को नई दिशा देगा।
