अनुभूति : लंबे चौधरी और होली की मस्ती
बात उन दिनों की है जब मैं अपने जनपद बदायूं के एस.के. इंटर कॉलेज में फर्स्ट ईयर में पढ़ रहा था। कॉलेज में होली की छुट्टियां हो गई थीं और मैं होली मनाने गांव आ गया था। उन दिनों होली कम से कम एक सप्ताह की होती थी। गांव में एक थे लंबे चौधरी। उनका असली नाम क्या था किसी को नहीं मालूम, सब उन्हें लंबे चौधरी के नाम से ही जानते थे। लंबी चौड़ी कद काठी, गठा हुआ शरीर और रूआबदार चेहरा। निपट अनपढ़ थे। मगर उनकी स्मरण शक्ति बड़ी गजब की थी। हम लोग गांव के रिश्ते से उन्हें बाबा कहते थे, मगर लंबे चौधरी हम लोगों से भी हंसी मजाक और ठिठोली करने से नहीं चूकते थे।
एक बार हम लोगों ने होली पर लंबे चौधरी को उनकी हंसी मजाक का जवाब उन्हीं के अंदाज में देने की योजना बनाई। लंबे चौधरी को छेड़ने का मतलब था, सांप के बिल में हाथ डालना। मगर हम लोग अपने निर्णय पर अडिग थे। हमारी योजना तब और आसान हो गई। जब लंबे चौधरी के हम लोगों के हम उम्र चार-पांच भतीजे हमारी योजना में शामिल हो गए। होली के चार-पांच दिन बाकी रह गए थे। गांव में होली का उल्लास पूरे जोरों पर था। रात को काफी देर तक बड़ी चौपाल पर ढोल-नगाड़े के साथ होली के गीत होते रहते और आधी रात के बाद शुरू होता गांव की होली को ऊंचा और बड़ा करने का अभियान। सब दूर-दूर से सूखी लकड़ी पेड़ों की टहनी, पुराने ठूंठ लेकर आते अैर होली पर डालते।
एक रात जब सब लोग होली बढ़ाने के अभियान के लिए चले गए, तो योजना के अनुसार हम लोग लंबे चौधरी की चौपाल पर पहुंचे, मगर हम लोग यह देखकर हैरान रह गए कि लंबे चौधरी जाग रहे थे। लगातार तीन दिन तक हम लोग आधी रात के बाद लंबे चौधरी की चौपाल पर जाते रहे मगर हमें सफलता हाथ नहीं लगी। अगली रात को जब हम लोग लंबे चौधरी की चौपाल पर पहुंचे, तो हम सब की बांछें खिल गईं। वे गहरी नींद में सो रहे थे और उनके खर्राटे दूर-दूर तक गूंज रहे थे। ईश्वर शायद आज हम लोगों पर कुछ अधिक ही मेहरबान था। लंबे चौधरी चौपाल पर बिल्कुल अकेले थे।
अपनी योजना के अनुसार हम लोगों ने रस्सी से लंबे चौधरी को चारपाई से अच्छी तरह से बांध दिया और फिर हममें से चार लड़के लाठियां डालकर चारपाई को कंधों पर रखकर होली की तरफ चल दिए। किसी खतरे की सूचना देने के लिए दो-तीन लड़के हमसे कुछ दूरी पर आगे-आगे चल रहे थे और दो-तीन पीछे-पीछे। यह एक संयोग ही था कि हमें किसी ने नहीं देखा और बिना किसी रुकावट के हम लोग होली के पास पहुंच गए। हमने लंबे चौधरी को चारपाई सहित होली पर रख दिया और फिर चुपचाप अपने-अपने घरों को लौट गए।
सुबह जब गांव के लोग जागे तो सबने होली पर एक अजब नजारा देखा। होली के ढेर पर चारपाई से बंधे लंबे चौधरी खर्राटे भर कर सो रहे थे। धीरे-धीरे होली के आसपास लोगों की भीड़ जमा हो गई। लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे। लोगों की आवाजें सुनकर लंबे चौधरी जाग गए। उन्होंने चारपाई से उठने की कोशिश की मगर चारपाई से अच्छी तरह से बंधे होने के कारण वे उठ नहीं पाए। उन दिनों गांवों में यह मान्यता थी कि होली के ढेर पर एक बार जो चीज रख दी गई उसे वापस नहीं उठाया जा सकता। अब लंबे चौधरी के साथ क्या किया जाए, सब इसी के बारे में बातचीत कर रहे थे। धीरे-धीरे पूरा गांव वहां जमा हो गया था। हम लोग भी एक तरफ खड़े यह नजारा देख रहे थे। इस समस्या पर विचार करने के लिए गांव के कुछ बुजुर्गों की एक पंचायत बैठी। काफी देर के विचार-विमर्श के बाद उन लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि लंबे चौधरी के भाई लंबे चौधरी के वजन से दोगुनी लकड़ी होली के ढेर पर रखें तभी लंबे
चौधरी को होली के ढेर से उतारा जा सकता है।
अब इतनी सूखी लकड़ी कहां से आए यह समस्या चौधरी के भाईयों के सामने मुंह बाए खड़ी थी। उन लोगों ने अपनी एक पुरानी बैलगाड़ी को कई घंटे की मेहनत के बाद कुल्हाड़ियों से चीरकर होली के ढेर पर रखा तब कहीं जाकर लंबे चौधरी को होली के ढेर से उतारा जा सका। लंबे चौधरी की यह हालत देखकर लोग मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। औरतें घूंघट मुंह में दबाकर हंस रही थीं। लंबे चौधरी किसी नाग की तरह फुफकार रहे थे और धारा प्रवाह गालियां दे रहे। उनकी गालियां भी हम लोगों को होली के प्रसाद की तरह लग रही थीं। -सुरेश बाबू मिश्रा
