लखनऊ विकास नगर अग्निकांड : बेघर परिवार बचे-बिखरे सामानों की कर रहे हैं रखवाली, खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बृहस्पतिवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात नष्ट हो गयी विकास नगर की एक झुग्गी बस्ती के जले हुए अवशेष उस विनाशकारी आग की मूक गवाही दे रहे हैं, जिसने सैकड़ों लोगों को बेघर कर दिया। दो दिन पहले तक जो पुरुष, महिलाएं और बच्चे यहां व्यवस्थित रहते थे, वे अब काली पड़ी जमीन पर बिखरे अरमानों के बीच सुस्ताने की कोशिश कर रहे हैं। 

जब 'पीटीआई-भाषा' ने आधी रात के आसपास घटनास्थल का दौरा किया, तो दर्जनों परिवार खुले में सोते हुए या कबाड़ से बने अस्थायी इंतजामों का इस्तेमाल करते हुए दिखे। कई लोगों ने कहा कि उन्होंने जली हुई बस्ती में इसलिए रुकने का फैसला किया ताकि वे अपने बचे हुए सामान को चोरी या नष्ट होने से बचा सकें। विकास नगर में बुधवार शाम को भीषण आग ने लगभग 200 झुग्गियों को नष्ट कर दिया और सारा सामान राख में तब्दील हो गया। 

अधिकारियों ने दो बच्चों की मौत की पुष्टि की है, जिनकी उम्र लगभग दो साल या उससे कम थी। आशंका है कि भैंस और बकरियों समेत कुछ मवेशी भी आग में जलकर मर गए हैं। आग पर बृहस्पतिवार सुबह तक काबू पाया जा सका, लेकिन अगले दिन तक भी धुएं और गर्मी का असर बना रहा। इससे पहले, बृहस्पतिवार को यहां के बाशिंदे बड़ी संख्या में मलबे में से कीमती सामान निकालने की उम्मीद में वापस लौटे थे। 

हालांकि, अधिकांश को मुड़ी हुई धातु, जले हुए बर्तन और अपने पुराने घरों के टुकड़ों के अलावा कुछ नहीं मिला। आधी रात तक, लखनऊ नगर निगम की टीम मलबा हटाने में जुटी थीं। मौके पर मौजूद एक सफाईकर्मी ने बताया कि सफाई का काम दिन-रात चलता रहा और शुक्रवार सुबह कुछ देर रुकने के बाद फिर से शुरू हुआ। मलबे के बीच, निवासियों के छोटे-छोटे समूहों ने अपने नुकसान और जीवित रहने की कहानियां साझा कीं। 

एक 'डीजे बैंड' में काम करने वाले अंकित (23) और गोलू (19) एक टूटी-फूटी लोहे की अलमारी पर चादर ओढ़कर सोने की तैयारी कर रहे थे। अंकित ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, "जो कुछ बचा है, उसे बचाने के लिए हम यहीं रुके हुए हैं।" गोलू ने कहा कि उसकी झोपड़ी पूरी तरह से नष्ट हो गई है। उसने कहा कि हाल में खरीदा गया स्मार्टफोन भी जल गया । 

मूल रूप से सीतापुर जिले के निवासी गोलू ने कहा, ''मेरा फोन तो चला गया, लेकिन मैंने अभी तक उसकी सिर्फ एक ही ईएमआई चुकाई है और यह बात मुझे बहुत परेशान कर रही है।" स्थानीय अस्पताल में काम करने वाले शिवम (28) अपने परिवार के साथ खाना खा रहा था। उसने कहा, ''जब आग लगी, तब मैं ड्यूटी पर था। जब तक मैं पहुंचा, सब कुछ जलकर राख हो चुका था।'' 

उसने बताया कि उसके पास फिलहाल पैसे नहीं बचे हैं। उसकी मां सोनी (55) ने बताया कि उनके गहने भी आग में जल गए। विनाश की व्यापकता के बावजूद, निवासियों ने कहा कि स्वयंसेवकों और स्थानीय समूहों के निरंतर सहयोग से भोजन-पानी की तत्काल कमी नहीं है। हालांकि, कई लोगों ने बुनियादी आश्रय की आवश्यकता व्यक्त की। करीब 45 वर्षीय एक महिला ने कहा, ''सब कुछ नष्ट हो गया है। कम से कम हमें सिर ढकने के लिए तिरपाल या कोई छत तो तत्काल मिलनी ही चाहिए।" राहत कार्य देर रात तक जारी रहा। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (प्रताप नगर इकाई) के सेवा विभाग के स्वयंसेवक आग लगने के तुरंत बाद से ही घटनास्थल पर सक्रिय थे और प्रभावित परिवारों को भोजन, पीने का पानी और दान में मिले कपड़े वितरित कर रहे थे। स्थानीय निवासी भी आगे आए। पास के मुंशी पुलिया इलाके में रेस्तरां चलाने वाले जावेद अली ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर बच्चों के लिए खाने के पैकेट और दूध बांटा। उन्होंने बताया, "घटना की खबर सुनते ही हम तुरंत आ गए। हमने देर शाम से अब तक खाने के लगभग 100-150 पैकेट बांटे हैं।" 

उनके सहयोगी सलमान ने बताया कि बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने दूध के पैकेट भी बांटे। अन्य स्वयंसेवी समूहों ने भी भोजन और पानी वितरित किया। एक गैर-सरकारी संगठन के सदस्य यह जानकर मौके पर पहुंचे कि कई परिवारों के पास खुले में सोने के लिए बुनियादी चीजें भी नहीं है। वे चादरें और तौलिए लेकर पहुंचे। 

एक कार्यकर्ता ने बताया, "लोगों को खाना तो मिल रहा है, लेकिन उनके पास सोने के लिए कुछ नहीं है। हमने जरूरी सामान इकट्ठा किया और उसे यहां बांटने के लिए लाए।" अधिकारियों ने बताया कि घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और राहत कार्य जारी हैं। उन्होंने कहा कि आग लगने का सटीक कारण अभी पता नहीं चल पाया है। जिलाधिकारी विशाख जी ने बताया कि आग लगने के कारण का पता लगाया जा रहा है।  

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