संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक का सफर: पति की बीमारी के बाद भी नहीं टूटी गार्गी, दोबारा मिसाल बनकर उभरीं

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
On

कोरोना काल में कारोबार बंद होने के बाद जमीनी स्तर दोबारा खुद को किया साबित

मुरादाबाद, अमृत विचार। लॉकडाउन में गत्ता फैक्ट्री बंद होने के बाद जिस महिला के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया था, आज वही गार्गी रानी गांव की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं। डबल एमए व बीएड डिग्री धारी गार्गी वर्ष 2020 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ीं और बीसी सखी बनकर अपनी नई पहचान बनाई।

उपायुक्त स्वत: रोजगार आरपी भगत ने बताया कि गार्गी की शादी 2012 में हुई थी। 2019 में पति की रीढ़ की हड्डी में समस्या के कारण परिवार को गुरुग्राम से ठाकुरद्वारा ब्लॉक के गांव रतुपुरा लौटना पड़ा। जिसके बाद यहां शुरू की गई गत्ता फैक्ट्री 2020 के लॉकडाउन में बंद हो गई। आर्थिक संकट के बीच उन्होंने उसी वर्ष 13 जुलाई को अपनी दस पूर्व महिला कर्मचारियों के साथ कुंज स्वयं सहायता समूह बनाकर बीसी सखी के लिए आवेदन किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने गांव में बैंकिंग सेवाएं शुरू कर दीं। अब वह गांव के लिए चलता-फिरता बैंक बन गई और आमदनी भी बढ़ गई। सरकार से मिली 75 हजार रुपये की सहायता से गार्गी ने बैंकिंग किट, फिंगरप्रिंट मशीन और अन्य उपकरण खरीदे। अब वह फिनो पेमेंट बैंक के माध्यम से आधार आधारित भुगतान प्रणाली से नकद निकासी, जमा, डीबीटी, वृद्धावस्था पेंशन और गैस सब्सिडी जैसी सेवाएं दे रही हैं। उन्होंने 125 से 150 मनरेगा मजदूरों के जीरो-बैलेंस खाते खुलवाए उन्हें बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है । गांव-गांव जाकर लेनदेन करने पर मिलने वाले कमीशन से वह प्रतिमाह औसतन 3,000 से 4,000 रुपये कमा लेती हैं,जबकि मनरेगा भुगतान के समय आय और बढ़ जाती है। इसके साथ ही वह ड्रोन दीदी के रूप में उन्होंने हैदराबाद से 15 दिन का प्रशिक्षण लिया। खेतों में दवा छिड़काव के लिए 400 रुपये प्रति एकड़ की दर से काम करती हैं और सीजन में 20 से 25 हजार रुपये तक मासिक आय अर्जित कर लेती हैं।

आपात स्थिति में घर जाकर भी करती है निकासी
गार्गी केवल बैंकिंग सेवाओं तक सीमित नहीं हैं। वह आपात स्थिति में बुजुर्गों और जरूरतमंदों के घर जाकर भी नकद निकासी करती हैं। एक गंभीर रूप से बीमार बुजुर्ग महिला के लिए उन्होंने रात में घर पहुंचकर 18 हजार रुपये निकलवाए, जिससे उनका इलाज संभव हो सका। मशरूम की खेती के लिए उन्होंने ऋण लेकर एसी प्लांट स्थापित किया है और 8 लाख रुपये की सब्सिडी प्रक्रिया में है। ग्राम संगठन की अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अन्य महिलाओं को महिला मेट और दो महिलाओं को बीसी सखी बनने में मदद की है। गार्गी आज गांव में महिला सशक्तिकरण, तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता की सशक्त मिसाल बन चुकी हैं।

संबंधित समाचार